चक्का जाम और सामाजिक हड़ताल

शाहीन  बाग़ और होंडा की सीख

हड़ताल और चक्का जाम हर दौर में पूंजी के ख़िलाफ मजदूरों के सामूहिक विद्रोह का सबसे प्रभावशाली हथियार रहा है. इस दौर में शाहीन बाग़ ने इसमें नई जान फूंक दी. शाहीन बाग़ और होंडा के मजदूरों ने एक बार फिर दिखा दिया कि वास्तविक हड़ताल और चक्का-जाम पार्टियों और ट्रेड यूनियनों का बंधा-बंधाया प्रोग्राम नहीं है जिसे इच्छा अनुसार कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है. और न ही यह मुट्ठीभर ‘अराजकतावादियों’ की कारिस्तानी है. यह सामूहिक मजदूर की स्वतःस्फूर्त जन कारवायी है. जो दी गई ऐतिहासिक परिस्थितियों में पूंजी के सामाजिक संबंधों में दरार पैदा कर देती है. आर्थिक और राजनीतिक के भेद को मिटा देती है. इतिहास का पहिया रोक देती है. मिलजुलकर एक नयी दुनिया बनाने की संभावनाएं पैदा करती है. इसी संभावना का नाम है शाहीन बाग़. जिसका गला घोंटने की कोशिश पुरानी दुनिया के तमाम झंडाबरदार कर रहे हैं. जो शाहीन बाग़ की अंतर्वस्तु को मार कर बस उसके रूप का यांत्रिक दुहराव चाहते हैं. आर्थिक और राजनीतिक का अलगाव चाहते हैं. शाहीन बाग़ नहीं, उसका मंच चाहते हैं. ताकि इसे फिर से प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र के मातहत कर सकें. ताकि इसे अपने मुर्दा राजनीतिक प्रोग्राम का हिस्सा बना सकें और खुद को इसका नेता घोषित कर सकें. लेकिन वो ऐसा करने की हिमाकत तब तक नहीं कर सकते जबतक आंदोलन का आतंरिक-बाह्य विस्तार रुक न जाये, आंदोलन खुद अपने ही अंतर्विरोधों को छुपाने के चक्कर में यांत्रिक न हो जाये. इसलिए अगर हमे शाहीन बाग़ का सच में जिन्दा विस्तार चाहिए तो हमें उसके यांत्रिकरण की प्रक्रियाओं की आलोचना भी करनी होगी. आन्दोलन के अपने अंतर्विरोधों की पड़ताल करनी होगी. आज के समय चक्का-जाम और हड़ताल का मतलब हमें फिर से खोजना (reinvent) होगा.

हड़ताल और चक्का-जाम महज अपनी मांगों को लेकर उत्पादन(production) और संचलन(circulation) रोकना नहीं बल्कि काम के संबंधों की वास्तविक आलोचना भी है. पूंजी के सामाजिक संबंधों को लगातार तोड़ते चले जाना यानि पूंजी की सत्ता को खदेड़ते चले जाना है. जिसे हम सामाजिक हड़ताल और सामाजिक आत्मनिर्णय की प्रक्रिया कहते हैं. फैक्ट्रियों, हाईवे, यूनिवर्सिटियों और शहर के अलग-अलग इलाकों पर मजदूरों का कब्ज़ा इसी प्रक्रिया का आरंभिक क्षण है. और आज जब पूरा शहर ही एक विशाल कारखाना बन गया है, संचलन(circulation) भी उत्पादन(production) का एक क्षण हो गया है, नई टेक्नोलॉजी ने हमारे सारे सामाजिक संबंधों को सीधे-सीधे पूंजी और मुनाफ़े के उत्पादन में झोंक दिया है, सामाजिक-आर्थिक हायरिंग और फायरिंग की प्रक्रिया पहले से कहीं ज्यादा तेज़ हो चली है, ऐसे में बिना हड़ताल और चक्का-जाम के कोई भी धरना-प्रदर्शन सत्ता को वास्तविक चुनौती नहीं दे सकता. हड़ताल और चक्का-जाम बिना कब्ज़े के चल नहीं सकता और कब्ज़ा पूंजी की सामाजिक सत्ता तोड़े बिना संभव नहीं. होंडा और शाहीन बाग़ की हड़ताल ने मजदूर-वर्ग की इसी सीख को हमारे सामने स्पष्ट किया है.

शाहीन बाग़ का चक्का-जाम का मॉडल सिर्फ सामाजिक-आर्थिक छँटनी के लिए लाये गए कानून (CAA-NRC) के खिलाफ विरोध का मॉडल नहीं है बल्कि ऐसे कानूनों को गढ़ने वाली हिंसा का भी मुहतोड़ जबाब है. राज्य-सत्ता को गढ़ने वाली हिंसा, जो हमारे सामाजिक संबंधो के भीतर ही सक्रिय है, उसकी सतत आलोचना है. पूंजी के हिंसक सामाजिक संबंधों को तोड़ने वाली हिंसा का नाम है – चक्का-जाम. इसलिए चक्का-जाम का मॉडल कोई बंधा-बंधाया मॉडल नहीं है बल्कि एक जिन्दा मॉडल है. जिसे अलग-अलग इलाकों-सेक्टरों में काम करने वाले मजदूर अपनी-अपनी ख़ास परिस्थितियों के अनुसार इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसा होंडा के मजदूरों ने किया. हजारों ठेका मजदूर अपनी और अपने साथियों की छँटनी के ख़िलाफ फैक्ट्री के भीतर ही धरने पर बैठ गए. फैक्ट्री का चक्का-जाम कर दिया. उत्पादन ठप्प कर दिया. आस-पास की यूनिट्स जो किसी न किसी रूप में होंडा से जुड़े थे, उसे माल सप्लाई करते थे, उनके उत्पादन और संचलन को सकते में डाल दिया. परमानेंट मजदूरों को भी साथ आना पड़ा. कॉलनियों के मकान मालिक भी घबरा गए. उन्हें किराया न मिलने की चिंता सताने लगी. ठीक इसी तरह शाहीन बाग़ के मजदूरों ने CAA-NRC के ख़िलाफ, अपनी सामाजिक-आर्थिक छँटनी के ख़िलाफ, जामिया के साथियों पर हुई हिंसा के ख़िलाफ, कालिंदी कुंज हाईवे को जाम कर दिया. हजारों की संख्या में सड़क पर बैठ गए. हाईवे पर बने सारे शो-रूम बंद कर दिए गए. उनका किराया माफ़ कर दिया गया. जहाँ बाकि प्रदर्शनों को शहर के दूसरे हिस्सों में फैलने से रोकने के लिए बर्बर दमन का सहारा लिया जा रहा था, वहीं शाहीन बाग़ के मजदूरों ने अपने इलाके में ही सड़क जाम कर इस शहरी कारखाने की दूसरी यूनिटों -सरिता विहार, जसोला, ओखला, गुडगाँव, नोएडा आदि- में भी चक्का-जाम की स्थिति तैयार कर दी. गुडगाँव और मानेसर की कंपनियों का काम स्लो कर दिया. राज्य-प्रायोजित हिंसा को रोकने के लिए महिलाओं और बच्चों ने चक्का-जाम की कमान संभाल ली. पुलिस के बैरिकेडों का इस्तेमाल नौजवानों ने जन-घेराबंदी के लिए कर लिया. जिन बेरोजगार नौजवानों को आम दिनों में ‘लम्पट’ कहा जाता था और ‘सभ्य-समाज’ उनसे दूरी बना कर रखता था, वही नौजवान आंदोलन में सबसे आगे बढ़ कर बैरिकेडों पर रात-दिन पहरा देने लगे. पुलिस और आरएसएस के गुंडों से इलाके की हिफ़ाजत करने लगे. दिहाड़ी मजदूर और घरों-दुकानों-कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं ने आन्दोलन का नेतृत्व किया. धीरे-धीरे छात्र-कलाकार भी आन्दोलन से जुड़ते चले गए. मिलजुलकर शिफ्टों में आपसी सहयोग से नौजवानों, बच्चों और महिलाओं ने खाने-पीने से लेकर सोने-जागने तक का इंतजाम किया. ताकि कब्ज़े को लम्बे समय तक बरक़रार रखा जा सके. यानि इस आन्दोलन ने घर और बाहर काम और पैसे के जितने भी संबंध हैं सब का चक्का-जाम कर दिया. पैसे और सत्ता की किसी भी तरह की मध्यस्थता (mediation) को नकार दिया. इसलिए तो आन्दोलन के शुरुआती दिनों में मीडिया से लेकर नेताओं तक ने चुप्पी साध रखी थी. ऐसा नहीं है कि ये आन्दोलन के बीच घुसने की कोशिश नहीं कर रहे थे, मंच हथियाने की कोशिश नहीं कर रहे थे. लेकिन जबतक आन्दोलन की सामूहिक ताकत जिन्दा थी इसने मंच को मंच बनने नहीं दिया. इसके बहुविध चरित्र ने कुछ समय के लिए ही सही आर्थिक और राजनीतिक के अलगाव को रोक दिया.

अपनी भौतिकता में शाहीन बाग़ होने का मतलब किसी कानून या निजाम के विरोध से आगे बढ़कर पूंजी के उन सामाजिक संबंधों की आलोचना है जो बुर्जुआ समाज और लोकतंत्र में किसी भी कानून का आधार बनती है. इसलिए शाहीन बाग़ न तो ‘लोग’ का आन्दोलन है और न ‘नागरिक’ का. क्यूंकि पूंजी के सामाजिक संबंध ही ‘नागरिक’ और ‘राज्य’ के संबंधों को पुनरुत्पादित करते हैं, अपने अंतर्विरोधी संबंधों को ‘लोग’ के समरूप संबंधों में बाँधकर. और फिर उनमें से कुछ ‘मुसलमान लोग’ हो जाते हैं, कुछ ‘हिन्दू लोग’! कुछ ‘दलित लोग’ हो जाते हैं, कुछ ‘ब्राह्मण लोग’! कुछ ‘अमीर लोग’ हो जाते हैं, कुछ ‘गरीब लोग’! कुछ ‘लोकल लोग’ हो जाते हैं, कुछ ‘बाहरी लोग’! कुछ ‘शरणार्थी’ हो जाते हैं, कुछ ‘घुसपैठिया’! कुछ ‘राष्ट्रवादी’ हो जाते हैं, कुछ ‘राष्ट्रद्रोही’! सब अपनी निकट पहचान पा लेते हैं. सब महज संख्या बन जाते हैं और राज्य के सामने सब बराबर- ‘एक वोट, एक वैल्यू’! यानि बराबरी का वास्तविक मतलब है- जिनके पास ज्यादा संख्या होगी उनका ही शासन चलेगा. यही ‘सेकुलरिज्म’ है. जो मोदी-शाह के दौर में खुलकर अपना रंग दिखा रहा है. इसलिए शाहीन बाग़ की लड़ाई न तो ‘सेकुलरिज्म’ बचाने की लड़ाई है और न ही ‘संविधान’ बचाने की. यह तो ‘मुसलमान’ मजदूरों की लड़ाई है जो खुद के ‘मुसलमान’ पहचाने जाने के ख़िलाफ हैं, खुद को ‘मुसलमान’ तक सीमित किये जाने के ख़िलाफ हैं, जो इस शहरी कारखाने के किसी खास हिस्से में खुद को ढकेल दिए जाने के ख़िलाफ हैं. यह उन मजदूरों की लड़ाई है जिन्हें अपनी शर्तों पर लड़ना आता है. जिन्हें किसी की सहानुभूति या नेतृत्व की जरुरत नहीं. वो अपना नेतृत्व खुद कर सकते हैं. इसलिए आज जो भी खुद के पहचाने जाने के ख़िलाफ हैं वे उन मजदूरों की लड़ाई के साथ हैं. वे सब मुसलमान हैं. हम सब मुसलमान हैं.

जो यह कह रहे हैं कि शाहीन बाग़ की लड़ाई ‘मुसलमानों’ की लड़ाई है, वो सच भी कह रहे हैं लेकिन सरासर झूठ भी. यह सच है कि शाहीन बाग़ की लड़ाई मुसलमानों की लड़ाई है. लेकिन मुसलमानों की लड़ाई होकर ही यह इस व्यवस्था में बार-बार खुद को ‘मुसलमान’ के रूप में (पुनः)उत्पादित किये जाने के खिलाफ भी है. पूंजीवादी व्यवस्था इस शहरी कारखाने का बार-बार जिस तरह (पुनः)उत्पादन करती है – मजदूर आबादी का सामाजिक-आर्थिक विभाजन करती है – उन्हें शहर के किसी खास इलाके में, खास सेक्टर में, खास ढंग से रहने-खाने और काम करने को मजबूर करती है – यह लड़ाई उसके ख़िलाफ है. इसलिए यह हम सब की लड़ाई है. यह शाहीन बाग़ के भीतर और बाहर पैसे और काम के संबंधों की वास्तविक आलोचना है. इसलिए अपनी-अपनी जगहों पर पैसे और काम के संबंधों को बिना तोड़े न तो शाहीन बाग़ का जिन्दा विस्तार हो सकता है और न ही कोई उसके साथ खड़ा हो सकता है. पैसे और काम के सामाजिक संबंधों को तोड़ते हुए साथ आना ही सामाजिक हड़ताल है, सचमुच का चक्का-जाम है. जिसकी संभावना आन्दोलन के शुरुआती दिनों में शाहीन बाग़ में दिखी. जब चक्का-जाम के दौरान साथ आने की प्रक्रिया में समुदाय  के भीतरी और बाहरी अंतर्विरोध खुलकर सामने आने लगे. जब मकान-मालिक और किरायेदार, दुकानदार और शोरूम के मालिक और वहाँ काम करने वाले मजदूर, नौजवान और बूढ़े, पुरुष और महिलायें, कामकाजी महिला और  हाउसवाइफ, हाउसवाइफ और महिला डोमेस्टिक वर्कर, माँ और बेटी, छात्र-कलाकार और दिहाड़ी मजदूर, धर्म के ठेकेदार और दिहाड़ी इमाम, कंपनियों में काम करने वाले नौजवान और सड़क पर भीख मांगने वाली बच्चे-बच्चियाँ…सब के बंधे-बंधाये सामाजिक संबंध चरमराने लगे. यानि एक समुदाय के रूप में खुद पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ चक्का-जाम करने के लिए साथ आने की प्रक्रिया में ही वह सामाजिक-आर्थिक विभाजन टूट भी रहा था जिसके सहारे यह व्यवस्था हमें ‘मुसलमान’ पहचानती है. यानि ‘मुसलमानों’ का आंदोलन होते हुए ही यह सिर्फ ‘मुसलमानों’ का आन्दोलन नहीं था. यानि तबतक चक्का-जाम के भीतर सामाजिक हड़ताल की संभावना मौजूद थी. आर्थिक और राजनीतिक का सम्पूर्ण अलगाव नहीं हुआ था. इसलिए तो कोई नेता या प्रतिनिधि चाह कर भी इसमें घुस नहीं पा रहा था. लेकिन धीरे-धीरे, सामाजिक हड़ताल की तरफ बढ़ने की जगह, सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों को तेज़ करने की जगह, आन्दोलनकारियों का सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित होने लगा कि किसी तरह हाईवे जाम बरक़रार रखा जाय. इस प्रक्रिया में अंतर्विरोधों पर पर्दा डाला जाने लगा. आन्दोलनकारी खुद को फिर से एक समुदाय के रूप में बाँधने लगे. आन्दोलनकारी ‘मुसलमान लोग’ हो गए. जिनका साथ देने ‘हिन्दू लोग’ भी आने लगे. ताकि आंदोलन को ‘सेकुलर’ पहचाना जा सके. यानि चक्का-जाम से सामाजिक हड़ताल की सारी संभावनाएं अलग कर दी गयी. चक्का-जाम की अंतर्वस्तु नकार दी गयी और बस उसका बाहरी रूप बच गया. जिसका हर रोज यांत्रिक दुहराव होने लगा. आन्दोलन थकाने लगा. यही वह समय था जब मीडिया आन्दोलन के बीच घुस आई और राजनीतिक पार्टियों के छुटभैया नेताओं ने मंच पर कब्ज़ा जमा लिया. विद्रोही आवाजों को दबाया जाने लगा, उन्हें आंदोलन के मंच से नीचे फ़ेंक दिया गया. दकियानूस लेफ्ट-लिबरल राजनीति ‘सेकुलरिज्म’ और ‘संविधान’ बचाने के नाम पर आलोचनाओं का गला घोंटने लगी. इनके लिए शाहीन बाग़ महज घूम-घूम कर भाषण देने और नाचने-गाने का अड्डा बन गया. अपनी सार्थकता खो चुके बुद्धिजीवी और कलाकार अपनी पहचान फिर से हासिल करने के लिए इसे मौके की तरह इस्तेमाल करने लगे. उन्होंने  शाहीन बाग़ को एक बड़े तमाशे में बदल दिया, जिसका इस्तेमाल (सोशल) मीडिया से लेकर अकादमिक प्रोडक्शन तक के लिए होने लगा.

इससे एक बात तो स्पष्ट है कि आज के समय कोई भी राजनीतिक और विचारधारात्मक स्वरूप जो आर्थिक और राजनीतिक के अलगाव को पहले से मान कर चलती है वह चाहे-अनचाहे पूंजी के (पुनः)उत्पादन का हिस्सा बन जाती है. यही नवउदारवादी पूंजी का चरित्र है. उसकी तानाशाही है. जहाँ हमारा प्रतिरोध अगर पूंजीवादी सामाजिक संबंधों की सम्पूर्ण आलोचना की तरफ नहीं बढ़ता, सामाजिक हड़ताल और सामाजिक आत्मनिर्णय की प्रक्रिया नहीं बनता, तो यह हमारे ही ख़िलाफ खड़ा हो जाता है. हमारे प्रतिरोध को ही पूंजी अपने (पुनः)उत्पादन का आधार बना लेती है. इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हरेक आन्दोलन के भीतर सामाजिक हड़ताल की संभावनाओं की पड़ताल की जाय. उसे आन्दोलन के दौरान सामने रखा जाए. आर्थिक के भीतर राजनीतिक और राजनीतिक के भीतर आर्थिक हड़ताल की मौजूदगी देखी और दिखाई जाय. उत्पादन के भीतर संचलन और संचलन के भीतर उत्पादन के क्षण को पहचाना जाये. हड़ताल के भीतर चक्का जाम और चक्का जाम के भीतर हड़ताल की स्थिति तैयार की जाये. तभी हमारा आन्दोलन एक वास्तविक आन्दोलन बन सकता है.

सहचर/CITYNOTES COLLECTIVE

‘बस नाम रहेगा…’

और कुछ हुआ न हो पर एक बात तो हो गयी. शरजील नाम ने एक लकीर खींच दी. आप शाहीन बाग़ के साथ खड़े हों और शहर में चक्का जाम के साथ न खड़े हों यह सरासर फ्रॉड है. आन्दोलन की शुरुआत में है चक्का जाम- हड़ताल. चीख़! नकार! निषेध! शहर पर हम शहरी कामगार बाशिंदों का हक़ है. हमें शहरी बताने वाले तुम कौन हो? जो हड़ताल के साथ नहीं हैं वो सब हमसे हमारे शहर को छीननेवाले गिरोह के साथ हैं. और हम कहाँ नहीं हैं? हम अपनी दिल्ली को तुम्हारी मानने से इनकार करते हैं. तुम्हारे शहर को रोक कर हम अपना शहर बसायेंगे. चक्का जाम महज माल और मजदूरों की आवाजाही रोकना नहीं है. वह शहर के उत्पादन को रोकने की शुरुआत भी है. दिल्ली, लाहौर, पेरिस, ढाका, हांगकांग, मैक्सिको या सैंटियागो- हर जगह के शहरी इसे जानते हैं. शहर माल-मुनाफा बनाने वाला, हमसे जबरन काम कराने वाला विशाल कारखाना है. उसकी विशालता उसके बिखराव में है. यह कारखाना झुग्गियों में, फ्लायोवर के नीचे और कूड़े के पहाड़ों से लेकर शहरी-गाँव की गलियों और घरों से होते हुए विशाल मॉलों और गुडगाँव-फरीदाबाद-मानेसर की चमचमाती कंपनियों के भीतर पसरा हुआ है. नालों की सडांध और काले धुएँ में लिथड़ा. हम ऐसे शहर का चक्का जाम न करें तो क्या करें? पूँजी की तानाशाही ऐसी कि जिंदा रहने की हर सूरत में हमें ऐसे शहर को चलाये रखने के लिए खटना-मरना पड़ता है. चक्का जाम हमारे खटने-मरने से हमारा इनकार है!

यह बात सही है कि हर जगह हम हड़ताल नहीं कर पा रहे. जहाँ हो रहा है विस्तार नहीं पा रहा. कामगार बाशिंदों के अलग-अलग खांचे टूट नहीं रहे. झुग्गियों और कंपनियों में, घरों और मुहल्लों में जबतक कामकाजी सम्बन्धों की आलोचना और तेज नहीं होगी हमारी सीमाएं बनी रहेंगी. चक्का जाम और कब्जे को सामाजिक हड़ताल में बदलने की ज़रुरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस हो रही है. बेरोज़गारी-छंटनी-डिटेंसन कैम्प के ख़िलाफ़ सामाजिक हड़ताल! आर्थिक और राजनीतिक आन्दोलनों का निरंतर प्रवाह! पेरिस में पिछले पचास दिनों से आम हड़ताल जारी है. हमें स्थितियों के भीतर जारी अंतर्विरोधों के और गहरे पैठना होगा. हमें अपनी कमजोरियों से इनकार नहीं है. पर क्या करने से इनकार करना है इसकी कुछ सीख तो पुरखे दे ही गए हैं. शाहीन बाग़ की सारी उत्सवधर्मिता का कोई अर्थ नहीं अगर चक्का जाम की भौतिक ताकत वहां नहीं. इस आरंभिक भौतिक ताकत में हम सबकी सोलिडेरिटी है. ऐसे प्रयासों की सहभागिता जहाँ अलग-अलग इलाकों में हम छात्र-बेरोज़गार-कलाकार-कामगार की सामूहिक कोशिशें स्थानीय अंतर्विरोधों में सक्रिय हस्तक्षेप के द्वारा अंतर्विरोधों में झांकते भीतरी वैरभाव और उसके वैश्विक पूंजीवादी चरित्र को देख और दिखा सकें. इस सामूहिक प्रक्रिया में प्रतिरोध का विस्तार है. पूँजी की तानाशाही के ख़िलाफ़ वास्तविक आन्दोलन ऐसे ही प्रयासों से संभव है. हमारे कई सहृदय अपनी तमाम सदाशयता के बावजूद ऐसी कोशिशों से बचना चाहते हैं. इस बचने की कोशिश में संविधान और राष्ट्र-राज्य की पूजा करने वाली लेफ्ट-लिबरल राजनीति जाने-अनजाने हिन्दू बहुलतावादी राजनीति को पुष्ट करती है. मोदी-शाह का काम आसान करती है. बात केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी की नहीं है. बात है कि अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे.ज़्यादा पुरानी बात नहीं जब ऐसे लेफ्ट-लिबरल्स मारुती-मानेसर के मजदूर सिपाहियों को मनेजमेंट के खिलाफ ‘जय बजरंग बली’ का नारा लगाते देख तत्काल उन्हें हिंदूवादी-संघी कहने से नहीं चुक रहे थे! हड़ताली-विद्रोही मजदूर इन्हें हमेशा ‘उपद्रवी’ या ‘साम्प्रदायिक’ दिखें तो कोई हैरत की बात नहीं!

रामविलास जी 27 जून 1857 को ‘इंग्लिशमैन’ में प्रकाशित एक घटना का ज़िक्र करते हैं- “ अंग्रेजों ने हैदराबाद में हिन्दुस्तानी पलटन रख छोड़ी थी. इसके सिपाहियों ने शहर के लोगों से कहा, बगावत में हमारा साथ दो. शहर के लोगों ने जगह-जगह इश्तहार चिपकाए. इसमें मुसलमानों से अपने धर्म की रक्षा के लिए विद्रोह करने को कहा गया. शहर की सबसे बड़ी मस्जिद में सभा हुई. इसमें ज़्यादातर निचले तबके (mostly of the lower orders) के लोग इकट्ठे हुए. मौलवी साहब जब व्याख्यान दे रहे थे, तब दो आदमियों ने उन्हें बोलने से रोका. “क्या औरतों की तरह बकवास कर रहे हो? जेहाद का झंडा उठाने को क्यों नहीं कहते?” कोतवाल वहां मौजूद था. उसने दोनों आदमियों को पकड़ लिया लेकिन तुरत ही वहां ख़ामोश शाह फकीर के शागिर्दों ने उन्हें छुड़ा लिया. लोगों ने ‘दीन दीन’ के नारे लगाए और कोतवाल तथा मौलवी भाग खड़े हुए… मस्जिद से लोगों को हटाने के लिए निजाम के अरब सैनिक भेजे गए. कुछ सिपाहियों ने अरब सैनिकों से कहा, धर्मयुद्ध में हमारा साथ दीजिये. उन्होंने तुरंत सिपाहियों का प्रस्ताव ठुकरा दिया और उन्हें सूचित किया, “हम यहाँ धर्म के लिए लड़ने नहीं आये, पैसा कमाने आये हैं”.”

धर्म की भौतिकवादी आलोचना के लिए जैसी तैयारी और जैसी राजनीतिक दृष्टि चाहिए वह इन लेफ्ट-लिबरल्स के पास कतई नहीं है. उनकी राजनीति मजदूर-विरोधी है. वे मार्क्स की इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं रखते कि धर्म केवल जनता की अफीम ही नहीं है “ धर्म पीड़ितों की आह है, वह इस हृदयहीन दुनिया का हृदय है, ठीक उसी तरह जैसे वह आत्माहीन परिस्थितियों की आत्मा है”. धर्म की आलोचना उन सामाजिक सम्बन्धों की भौतिक आलोचना है जो हमारी सामूहिक देहों से हमारी सामूहिक आत्मा को अलग करती है. इसलिए धर्म की आलोचना और पूंजीवादी सम्बन्धों की आलोचना अभिन्न है. शाहीन बाग़ का चक्का जाम श्रम-विभाजन की उस पूंजीवादी व्यवस्था में दरार पैदा करता है जिसे हम शहर कहते हैं. शरजील की गिरफ्तारी के खिलाफ वास्तविक लड़ाई इसी दरार को और गहरा करने में हैं. शहरी कामगार बाशिंदे ज़मीन खोद रहे हैं- खोदने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें अवसरवादी लेफ्ट-लिबरल्स के साथ की कोई ज़रुरत नहीं. उन्हें इनकी पुरानी टैक्टिक्स में कोई विश्वास नहीं. इनका यूनियन-संविधानवादी रास्ता और दूसरों को उपद्रवी-कमअक्ल साबित करने की कोशिशें शाह और मोदी को चुनौती देना तो दूर आगे बढ़ कर उनकी सहायता कर रही है.  शहर के छात्र-बेरोज़गार-प्रवासी शहरी कामगार, घरों और कंपनियों में काम करने वाली औरतों का मिलन-संगम जितना तेज हो रहा है सफ़ेद-पोश लेफ्ट-लिबरल्स उतने ही हिंदूवादी होते जा रहे हैं. शरजील नाम की लकीर जितनी गहरी होती जाएगी धर्म और पूँजी के ठेकेदारों की नींद उतनी उड़ती जायेगी. मजदूर आन्दोलन व्यक्ति-पूजा नहीं जानता. सत्ता व्यक्ति-पूजा चाहती है. लेफ्ट-लिबरल्स सत्ता को ऐसा करने में मदद करते हैं. पर यह सब हमारे आन्दोलन को रोकने के लिए नाकाफी है.

उट्ठेगा अनलहक का नारा, जो मैं भी हूँ और तुम भी हो…     

सहचर / CITYNOTES COLLECTIVE

चित्र और विद्रोही जी

जे.एन.यू हिंसा के बाद एक चित्र सोशल मीडिया पर आया और गया. चित्र में कुछ मेस मजदूर हैं. कहा जाता है कि इन मेस मजदूरों ने तीसेक छात्रों को संघी लम्पटों के हमले से बचाया. छात्रों ने इन ‘रक्षकों’ की तस्वीर खूब बाँटी.

चित्र का एक नेगेटिव है. इस नेगेटिव में कवि विद्रोही की ग़ैर-हाज़िरी है. ग़ैर-हाज़िरी है एक ऐसी प्रक्रिया की जिसे हम विद्रोही जी कहते हैं. विश्वविद्यालय की सीमाओं के भीतर न अंटने वाली विद्रोही प्रक्रिया. विद्रोही जी आजीवन छात्र-मजदूर की तरह रहे. व्यक्तिगत जीवन में आने वाली मुश्किलों के बावजूद परम्परागत अर्थों में न तो वह छात्र रहे और न मजदूरी की. न तो मध्यवर्गीय सफेदपोश हुए और न कभी शहर छोड़ा. अंतर्विरोधों से निर्द्वंद्व नहीं, उसमें गहरे धंसे. भेदों के भीतर सतत काट-छांट करते. परिवार और समाज से लड़ते, गलतियाँ करते, जीवन, कविता और राजनीति में बराबर सृजनरत. आन्दोलन को मजबूत करने में.  वे कोई संत या बोहेमियन नहीं थे. विश्वविद्यालय से निकाला गया उन्हें मजदूरों के साथ आन्दोलन करने के जुर्म में. यह सरकारी निष्कासन उनकी गैर-सरकारी जीवनप्रक्रिया की शुरुआत थी. एक ऐसी सामूहिक रचनाप्रक्रिया की शुरुआत जहाँ छात्र-कलाकार-कामगार का मिलन-संगम हो. उनकी सामूहिक ताकत बनती जाय. राज्य-सत्ता और परिवार के विरुद्ध विद्रोह और एक नयी दुनिया गढ़ लेने का हौसला. ‘कि हम सारी दुनिया के गुलामों को इकठ्ठा करेंगे, / और एक दिन रोम आयेंगे ज़रूर’. दिल्ली का यह ‘आदि विद्रोही’ शहर में एक भिन्न किस्म का सामूहिक प्रतिरोध विकसित करने की कोशिश करता रहा. कहना न होगा कि ऐसा प्रतिरोध छात्र-मजदूर काउंसिलों का सतत आलोचनारत विस्तार ही है. ‘जनि जनिहा मनइया जगीर मांगात ऽऽ / ई कलजुगहा मजूर पूरी सीर मांगात ऽऽ’. नेगेटिव में शहर की ऐसी ही अनुपस्थित राजनीति है. बर्बर प्रतिक्रान्ति से सचमुच लड़ सकने वाली ताकतें शहरों के भीतर विद्रोही जी की अपील दुहरा रही हैं- ओ दक्षिण,पूरब,पश्चिम और उत्तर के लोगो ‘मुझे बचाओ, मैं तुम्हारा कवि हूँ’.

चित्र के इस नेगेटिव से मोदी-शाह के साथ-साथ सफेदपोश शिक्षकों-कलाकारों की नींद भी हराम है. भेदों में उलझी दृष्टि मूल बैरभाव से चाह कर भी बच नहीं सकती. उनकी भेदपरक बुद्धि मैनेजमेंट करने लगती है. भावों का मैनेजमेंट, क्रिया का मैनेजमेंट. परन्तु आत्मा के मैनेजर विद्रोही जी की राजनीति को मैनेज नहीं कर पा रहे. राज्य-सत्ता का संकट इस मैनेजमेंट का संकट है. मारुती अब दिल्ली में घुस आई है. फैक्ट्री का संकट शहर का संकट बन चुका है. शहर और फैक्ट्री घुल मिल गए हैं. शाहीन बाग़ शहरी मजदूरों, बेरोजगारों-छात्रों , घरों और कंपनियों में काम करने वाली न मालूम औरतों की सामूहिक शख्सियत की संभावना का नाम है. सड़कों को जाम करने और मॉलों में घुस जाने और विश्विद्यालयों पर कब्जे से लेकर घरेलू कामों के बँटवारे के बीच शहर की टेढ़ी-मेढ़ी और पेचीदा गलियों में उलझे हुए अनेक अंतर्विरोध हैं. शहर को रोकने के लिए इन गलियों में उतरने और घुलने-मिलने की तेज होती प्रक्रियाओं की संभावना से शाह डरा हुआ है. इन प्रक्रियाओं को पुराने रूपों में पहचानने और उसके मातहत करने की कोशिशों का एक हिस्सा है JNU की पहचान का इस्तेमाल करना. शहर के नक़ाबपोशों से डरी हुई सरकार भाड़े के नक़ाबपोश बहाल कर रही  है. उनसे हमले करवा रही है. अराजकता-उपद्रव या फिर यूनियन-संविधानवादी ताकतें! इस दुई के अलावा पहचानने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं! जैसे-जैसे शहर में विद्रोही जी की अनुपस्थिति गहराती जायेगी आत्मा के सफेदपोश मैनेजरों की मैनेजमेंट लड़खड़ाती जायेगी. पुलिस और गुप्तचर की नियुक्तियों से वे बेरोज़गारी का संकट हल नहीं कर पाएंगे. दिखने और छपने का लालच देकर वे कवि-कलाकारों को बने बनाए खांचों में फिट नहीं कर पायेंगे. सच्ची अभिव्यक्ति के सामने देश,संविधान या धर्म का हर तिलिस्म भहरा कर गिर पड़ता है. कला अपने बलात् अमूर्तन के खिलाफ विद्रोह करती है. विद्रोही भावों के भीतर से नयी मानव सत्ता को गढ़ने में अपना योग देती है. आज का नौजवान कलाकार-कामगार कह रहा है- ‘रुको! और रोक दो!’ पुराने साथी की सीख काम आती है- ‘तूफानों के बीच अमर जीवन का अंकुर पले रे साथी!/ समय का पहिया चले’.

शहर में विद्रोही जी की बढ़ती जमात ‘सब बुत उठवाये जाने’ के साथ खड़ी है. उन्हें राज्य-धर्म के सेकुलर अनुवाद और अवतार का मोह नहीं है. अधबनी-अनबनी यह जमात आन्दोलन के भीतर प्रतिमा या अस्मिता निर्माण नहीं करती. वह मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया का भंडा-फोड़ करती है. आन्दोलन के छुटभैये नेता जो बुत बने फिरते हैं. सफ़ेद चोले, आवाज़ में शीन-क़ाफ- भीतर की लड़ाइयों को दबाते हुए, जनमजूरों को ‘लोग’ बनाते, चुनाव के गुणा-गणित में औसत करते, शिक्षित करने के नाम पर उनको महज कलपुर्जों में बदलते- इन सब बुतों को पहचानना और इनसे आन्दोलन की बागडोर छीनना ‘लौहे अजल में लिखा है’. दिल्ली में भी पटना में भी. जनमजूरों का ऐसा वास्तविक आन्दोलन जो ‘गायब भी है हाज़िर भी’. है और होने की दुई से परे. नागरिक और घुसपैठिये की दुई के खिलाफ और उससे परे. इस आन्दोलन की सामूहिक बुद्धि जानती है कि ‘बातिल दुई पसंद है’. पूँजी एक गतिशील अंतर्विरोध है. वह मनुष्यों के बीच के रिश्तों को बुतों के बीच के रिश्ते में और बुतों के बीच के रिश्तों को आदमियों के बीच के रिश्ते में बदलने वाली हिंसक ताकत है. मार्क्स बुत होने की इस प्रक्रिया को फेटीशाइजेशन कहते हैं. सामूहिक जनमजूर इस अर्थ में मूर्तिभंजन की प्रक्रिया है. वह सर्वहारा है. और इसमें कवि की आस्था है. ‘हम देखेंगे’ का विश्वास! तुम्हारे पाकिस्तान में भी, तुम्हारे हिन्दुस्तान में भी! हमारे फिलिस्तीन में भी, हमारे कश्मीर में भी!  

मार्तंड

अलेक्सांदर क्लूगे की कहानियाँ

(ड्रिलिंग थ्रू हार्डबोर्ड्स, वाइलैंड होबन के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)

ज़मीन जिन्हें प्रदर्शनों ने पूरी तरह निषिद्ध कर रखा है

एक लम्बी दूरी का ट्रेन स्टेशन, कारों का ढेर, कई सारे होटल और एक एअरपोर्ट कॉम्प्लेक्स अनभिज्ञ प्रवेशद्वार वाले शिलाखंडों से वहां खड़े हैं. पिछले (भू) दृश्य में एक सड़क व्यवस्था की तरह. यह तीसरा स्वभाव है.

तीसरा रनवे बिना किसी प्रदर्शन के बनाया गया, चौथे की योजना बन रही है. स्थानीय सरकार हाल के वर्षों में एअरपोर्ट के प्रति बरती गयी लापरवाही का दोहन कर रही है. पश्चिमी रनवे के खिलाफ प्रदर्शनों की शुरुआत एक जंगल से हुई; लड़ाके और पुलिस बलों को अपनी-अपनी जगह मिल गयी. अगर मान भी लिया जाय कि प्रदर्शन हो रहे थे-  फिर भी इस संरचना के आगामी विस्तार के खिलाफ  प्रदर्शनों को शुरू करने के लिए ऐसा पुख्ता लोकेशन मिलना इस बीच मुश्किल हो गया. जनता का आकर्षण अवसादपूर्ण तरीके से बह गया.

एडम स्मिथ और रिकार्डो औद्योगिक समाज की चर्चा दूसरे स्वभाव की तरह करते हैं. एक तीसरा स्वभाव है जो स्वयं को इससे ऐसे अलग करता है मानो गंगा-जमुना के दोआब में एक अकाशयान उड़ान भरने को तैयार हो; इसका यथार्थ निर्माण-स्केचों, बट्टे-खातों, भावी मूल्य या ध्वंस मूल्य में है. उन चीजों या लोगों में नहीं जो इनके भीतर चलते-फिरते हैं. तीसरे स्वभाव में एक घुमंतू न तो धुएँ  में छिपे आकाश के चिह्नों का अनुसरण कर पाएगा और न ही उसके लिए वहां कोई दिशा निर्देश होंगे. उसे वाहन, जहाज या मेट्रो द्वारा इमारतों के इस नेटवर्क में धंसना ही होगा.

क्रांतिकारी संग्रहालय से तियेनमेन चौराहे के जनसंहार की झाँकी

मैनफ्रेड सीफेर्ट (GDR) जर्मन जनतांत्रिक गणराज्य के टोही विभाग (HVA, विभाग IX)का जासूस था. 1989 की गर्मियों में वह कॉमरेड क्रेंज़ की चीन-यात्रा के साथ था. वहां चीन के जनगणराज्य की स्थापना का चालीसवां साल मनाया जा रहा था. हाले विश्वविद्यालय के मजदूरों और किसानों के विभाग में पूरी ट्रेनिंग पाने के चलते उसके हृदय में दो सौ साल बाद फिर से फ्रांस की क्रान्ति की आहट गूँज रही थी. हाँलांकि उस क्षण साथी तियेनमेन चौराहे पर स्थित क्रांतिकारी संग्रहालय के कमरों में थे. पार्टी ने उन्हें इंग्लैण्ड की एक निलामी में मार्क्स की मौलिक पांडुलिपियों की ख़रीददारी के लिए भेजा था. उनको वह अपने साथ स्टेट काउंसिल की तरफ से PRC (चीन के जनगणराज्य) की केन्द्रीय कमिटी को उपहार देने के लिए लेता आया था. वे अब संग्रहालय की दराज़ों की शोभा बढ़ा रहे थे. अपने अन्य साथियों के साथ, जिनमें फ्रेंच भी थे, अब वह उस भव्य इमारत की बड़ी खिडकियों से बाहर झाँकता है और बाहर घट रही घटनाओं को देखने लगता है: भागते लोग, गोलियों के निशान, फिर-फिर नए-नए बैरिकेड खड़ा करने की कोशिशें- हाँलांकि सैन्य बलों के शस्त्र वाहनों और टैंकों के सामने वे बिलकुल तुच्छ थे.

दर्शकों के पीछे जमे शो केस, जिसमें पुरानी क्रांतियों की पांडुलिपियाँ रखी थीं, बाहर की आगजनी को प्रतिबिंबित कर रहे थे: सीफेर्ट जैसे प्रशिक्षित दर्शक की आँखों में इसने एक व्याकुल चित्र खींच डाला. चौराहे से उपद्रवियों को भगाए जाने के खिलाफ कहने को उसके पास कुछ भी नहीं था. लेकिन अन्य साथियों के साथ-साथ उसके मन में भी इनके उपद्रवी होने को लेकर शंका थी. निश्चित रूप से स्वतंत्रता की प्रतिमा का कार्डबोर्ड लगाना एक भड़काऊ चीज़ थी, सरासर बेवकूफ़ी. परन्तु पिछले दिनों दीवार-अखबारों और उसकी अपनी बातचीत के जरिये सीफेर्ट के मन पर जो प्रभाव पड़ा था उससे लगता था कि आन्दोलन स्वयं में क्रांतिकारी गुण-धर्म रखता है. यहाँ तक कि कल उसे विश्वास हो चला था कि क्रान्ति अपना सर फिर उठा रही है. अपने मनःप्रभावों को अन्तःकरण में धारण करने से उसे पार्टी अनुशासन नहीं रोक सका. कहाँ लोग खत्म होते हैं, कहाँ उपद्रव शुरू होता है?  कौन तय करता है कि विद्रोह कैसा रूप ग्रहण करेगा?

रेले-बेले

पेरिस के पेट्रोल स्टेशनों पर पेट्रोल नहीं, TGV तंत्र में रुकावट, चार्ल्स द गॉल हवाईअड्डे पर भारी विलम्ब. यह सब सेवानिवृत्ति की उम्र सीमा बढ़ा कर 62 साल किये जाने के खिलाफ विरोध स्वरुप हुई हड़ताल का परिणाम है, सरकोजी द्वारा अनुमोदित एक बिल जिसे इसी बुधवार को सीनेट में पेश किया जाना है. स्टीफेन ऑस्ट सबकुछ करके हार गया पर पेरिस से बर्लिन पहुँचने में हुई भयानक देरी को टाल न सका. अपने तात्कालिक प्रभावों का संश्लिष्ट सार प्रस्तुत करने में वह हमेशा से ही अच्छा था. उसने यह कहा:

  • महान फ्रांस मुझे द्वितीय GDR की याद दिलाता है.
  • क्यों?
  • एक मुकम्मिल मरम्मत सेवा.
  • परन्तु GDR मुकम्मिल नहीं था.
  • अपने तरीके से, फ़्रांस मुकम्मिल है!
  • क्योंकि यह अक्टूबर क्रान्ति पर नहीं बल्कि महान फ्रांसीसी क्रान्ति पर टिका है?
  • यह किसी क्रान्ति पर नहीं टिका है.
  • तब किस पर?
  • यह अनोखा है. फ्रांस एक स्थिति है, कोई कार्यक्रम नहीं.
  • तुम्हें यह विचार आया कैसे? केवल इसलिए कि पेट्रोल स्टेशन पर पेट्रोल नहीं है?
  • दुनिया में कहीं भी कोई समाज ऐसा नहीं है जो आम हड़ताल के प्रति इतना सहज अनुकूलित है जितना फ्रांस में. कहने वाले इसे ब्राइकोलाज (टांकना/टिंकरिंग) कहते हैं.
  • लेविस्त्रास के हिसाब से ब्राइकोलाज का ताल्लुक उद्भव के नियम से है.
  • अगर समाज ज़िंदा रहना चाहते हैं, तो इसी तरह.

इन थोड़े से शब्दों में ऑस्ट अबतक अपने आरंभिक कसैलेपन का संशोधन कर चुका था. लग रहा था बेतुके फ्रांस से उसे सहानुभूति हो चली थी. क्या वह उन कठिन यातायात स्थितियों के प्रति कृतज्ञ था जिसने अभी-अभी अभिव्यक्त उसके विचार दिए? स्टीफेन ऑस्ट के पास ज्यादा वक़्त नहीं था. देरी के चलते सारी मुलाकातें रोक दी गयीं थीं. इस छिप्र-यात्री और उससे भी छिप्रतर-सोचने वाले आदमी ने एक ख़ास तौर पर प्यारा स्मृतिचिह्न अपने पास रख लिया: शब्द रेले-बेले. उसने पहले इसे कभी नहीं सुना था. उसने कहा कि ‘अफरा-तफरी’ इसका सही अनुवाद नहीं है. बेहतर समानार्थी ढूँढने में उसने काफी समय लगाया. देर रात उसने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या मुझे कोई अनुवाद मिला है. हमने इसे रेले-बेले [1] पर छोड़ दिया. ऑस्ट ने कहा कि यह अपनी ही सरकार के खिलाफ भयानक असंतोष का परिचायक है. परन्तु यह 200 साल के रुटीन के सन्दर्भ में हुआ(अफरा-तफरी या बुनकरों के विद्रोह की तरह नहीं). आखिर निम्नभूमियों द्वारा दम्भी पेरिस के खिलाफ, मजदूरों द्वारा संसदीय बहुसंख्यकों के खिलाफ, नौजवानों द्वारा युग के खिलाफ, उपनगरों द्वारा केंद्र के खिलाफ कौन से कदम उठाये जा सकते हैं? जो शामिल हैं वे एक लोग, एक राज्य या एक समाज नहीं हैं, बल्कि कहना चाहिए कि इन सब का एक कैलेडोस्कोप है. इतनी रात गए भी ऑस्ट अपनी लौटती यात्रा के पूर्वग्रह से बुरी तरह ग्रस्त था जिसमें फ्रांस के उसके अनुभव ने भयानक रुकावट पैदा कर दी थी. 

एक ‘मिलनशील समूह’[2] क्या है? /

रोजा लुक्सेमबर्ग और 1905 की क्रान्ति

‘मिलनशील समूह’ सभी क्रांतियों का तत्त्व है. मनुष्य बलों में शामिल होते हैं. जब तक उन्हें पता चलता है उससे पहले ही वे पुरानी जिंदगियों से निकल कर एक नए प्रकार की स्थिति में आ जाते हैं, जहाँ उनके गुण अनजाने ही जुड़ जाते हैं: उनकी इच्छाशक्ति के नीचे, शहर को जकड़ लेने वाली अव्यवस्था के प्रभावों के तले, और उनके तीक्ष्ण बोध और ओजस्विता के कारण. देहाती आबादी और जनों को भेजती है. वो कतारों में शामिल होते हैं. ‘नयी क्रांतिकारी मानव सत्ता’ (आरंभिक अस्थिर तत्त्व) व्यक्तियों, स्वयं पुराने मनुष्यों से नहीं बनती बल्कि कहना चाहिए कि उनके बीच आती है, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में लोगों को एक दूसरे से अलग करने वाले फासलों से.

कीव (शहर) में एक पाकेटमार देखता है कि वह एक मिलनशील समूह में है जो सेन्ट्रल स्टेशन की तरफ बढ़ा  जा रहा है. इसके सदस्य स्टेशन पर कब्जा करना चाहते थे. ज़ारशाही गार्ड भीड़ को ठिकाने लगाने का प्रयास कर रहे थे. ऐसा अवसर पाकर पाकेटमार उत्तेजित हो चला था परन्तु वह अपना पेशा भूल गया. आंदोलनकारियों के जत्थों के लिए रास्ता तलाशते गुप्तचरों में वह शामिल हो गया. रास्ता किनारे की गलियों से होता हुआ उस चौराहे तक जाता है जो सेन्ट्रल स्टेशन के ठीक सामने है. लड़के ने कई-एक घंटे कुछ नहीं चुराया. शाम भूखी बितानी पड़ी. उस दिन जोश के सिवा उसके पास कुछ न था.

एक वकील जिसे अपना समय हमेशा कीमती लगता है (वकील सेवा प्रदाता हैं) उसी समूह में अटक गया. वह विद्रोही गिरोह के साथ शहर में बढ़ता गया, भीड़ के साथ-साथ चलने से अनायास ही वह पुलिस बैरिकेडों पर हमले की ताकत बढ़ा रहा था. हाँलांकि वह इन सब को ग़ैरक़ानूनी मानता था. शाम ढलने तक वह शहर से गुजरता रहा.

रोज़ा लुक्सेमबर्ग ने, जो क्रान्ति के फूटने की खबर सुन कर बर्लिन से आई थी और देर से पहुंची थी, क्रान्ति के शुरूआती दिनों का अनुभव पुनर्निर्मित करने का प्रयास किया. उसने बयान इकट्ठे किये. रिपोर्ट सारे इस तथ्य पर राजी थे कि विद्रोह के पल में सन्देश, विचार या करने की प्रेरणाएँ लोगों के बीच जिस तेजी से फैलीं उतनी टेलीग्राफी या यातायात के साधनों के बस में नहीं था. लेइप्ज़िगेर फोक्ज़ेतुंग  के लिए लिखे लेखों में एक करुण आवेग के साथ वह कहती है कि उसे ऐसा लगा मानो एक एकल जीवन रूप (सिंगल लाइफ फॉर्म), एक क्रांतिकारी सामूहिक कामगार (रेवोल्यूशनरी कलेक्टिव वर्कर) क्रियावान था. थोड़े दिनों बाद यह केवल एक स्मृति थी. जिस ‘महाकाय’ के बारे में रोज़ा ने लिखा था वह इस बीच शायद बिखर गया था.

एक मानव शिशु की तरह नहीं, रोजा लुक्सेमबर्ग ने लिखा, जो एक छोटी पोटली की तरह जन्म लेती और जवान होती है, क्रान्ति एक भीम काया की तरह पैदा होती है, एक नया समाज, और इसमें शामिल व्यक्ति मानव सत्ताओं में वापस रूपांतरण के लिए उसे समय चाहिए. जीवन के अंत तक जो सवाल उसके (रोज़ा) सामने बना रहा, वह था: क्रान्ति रुपी उस महाकाय शिशु को पहले कुछ हफ़्तों तक ज़िन्दा कैसे रखा जाय, और फिर विशेषतः पहली शताब्दियों तक; कोई इसका पालन-पोषण कैसे करे? इस तरह के मिलन को रोज़मर्रा के उत्पादन की स्थितियों या पारिवारिक एकांत के तहत लम्बे समय तक बचाए रखने का कोई ज्ञात रास्ता नहीं है. एक गलत जीवन में क्रान्ति फल-फूल नहीं सकती. बिना क्रान्ति का कोई सही जीवन नहीं.   


[1] A corruption based on expression en avoir ras le bol: ‘to be fed up with something’

[2] घुलने-मिलने के अर्थ में/Merging Group.

CAA-NRC Rebellion: Against and Beyond the Duality of Citizen and Infiltrator

Shaheen Bagh, New Delhi
  • The process of the continuous surplusing of population in the Indian subcontinent—and the expanding army of the unemployed and the underemployed—has been slipping away to escape from the command of capital.
  • The struggle against the NRC-CAA is spreading in Delhi just as in other cities. From Jamia, Shaheen Bagh and New Friends Colony to Seelampur and Jafrabad, it is expanding in ways both known and unknown. The different and wide spread forms of protests and struggles have found a new footing in the anti-CAA/NRC/NPR agitations. From the daises and podiums erected that act as an easy electoral ground for the politicians in the opposition, for the voices of activists, solidarity givers, etc., to the occupied zones that witness the fires lit all night by the women, children and the young of already ghettoized urban areas; the sparks of these struggles are turning into a revolt of the precariats that is burning bright.
  • The struggle for freedom that began in Kashmir has begun to signpost itself in different forms of protests and struggles in the Indian mainland now.
  • With the abrogation of article 370 in Kashmir, bringing in the NRC in Assam and the impending CAA (and the imminent NRC/NPR) in the rest of the country; very clearly points towards a kind of crisis-management that is at action.
  • The actual civil war­— its intensification seen in the Indian mainland today after Kashmir, Assam and the rest of North-East in its respective ideological forms; from hyper to progressive nationalism — (to avoid class war) is continuously regulated and mystified by turning it into a barbaric war of identities.
  • In its barefaced operation of imperialism, it is necessary for the nation-state to churn its regulating and controlling mechanisms through the continuous production of the ‘outsider’ to control the masses.
  • Any form generated through this regulation/mystification will only feed into the imperialist content of the nation-state and make this barbaric war of identities only more barbaric.
  • Against these imperialists is the slogan: “Turn the molecular civil war into class war!
  • The passing of the CAA in both houses of the parliament done on religious grounds — although posed as the ‘logical classification’ of the non-Muslim population from 3 nations and 6 religious communities — openly expresses the worries of Amit Shah and of the state with regard to the surplus population and the sharpening of the contradictions within it. But the attempt to evade the threat of this surplus population, using the established Islamophobic form of the citizen-intruder duality, is backfiring.
  •  It is true that the revolt began in areas where the ‘Muslims’ form the majority of the working population. This is also because they will experience the immediate effects of this law. And especially those among them — ‘Muslim’ migrants— who come from Kashmir, Bengal, Bihar, etc., to work in cities like Delhi. But it is also true that the NRC-CAA will also be used to discipline other workers who can be labeled as ‘infiltrators’ at any time and thereby can be thrown away into the detention camps. In this manner, it is the state’s attempt at a certain kind of mobilization, and an othering that is based upon the duality of citizen and infiltrator, in order to segment and re-segment the working population. So, it is not only the Bangladeshi Muslims, the Nepalese Hindus and the Sri Lankan Tamils who will be affected by this law, but also other workers of the mainland who wander from one part of the subcontinent to another in search for work. In other words, the real purpose of the politics implicit in this law is to transform the struggle against the continuous entrenchment of workers from the social-factory into the fight between the ‘citizen’ and the ‘infiltrator’.
  • The power of these resistive eruptions in different corners of the city lies in their potential to crack and seep through the regimentary walls of the bourgeois city —to perhaps crumble down the hierarchical relations that segment and homogenize various parts of the city.
  • Post-the brutal crackdown in JMI and AMU, anti-CAA protests apparently erupted in these so-called Muslim localities, which is a result of nothing but this process of homogenization and hierarchical segmentation of space-times, using different historico- ideological coordinates; in this case, it is the ‘homogenous’ Muslim communal identity.
  • As soon as this homogeneity is challenged — which can especially be observed in the case of Shaheen Bagh (occupation of the locality and sealing- off of the financial vein of the city that is the NH48 highway — one sees the counter-mobilizations mounted by the state apparatuses (media/police/army) to re-homogenize these spaces; specifically to seal them off again in the public discourse in terms of Muslim communitarian politics.
  • Following the two-months long factory-occupation and strike by the Honda workers in Manesar, now a similar yet multitudinous form of resistance, emerging at Shaheen Bagh (led by the women of the locality but also seeing the equal participation by the young workers who study, teach, or work in tech companies give their time to this occupation), also marks a moment of re-organization of the city-factory.
  • The insurgency of these regimented space-times against their configuration into the city, not only disrupts the process of reproduction/ reconfiguration of the bourgeois city as a whole — which finds expression in the general disturbance caused in the productive/ reproductive processes in the city-factory of Delhi by the shutting down of metro stations, cancelling of buses, trains etc. — but also opens up and sharpens the contradictions within these homogenized space-times.
  • The moment of occupation is also the moment of re-organization. Since Shaheen Bagh turned the barricades against the state and its various policing agencies, internal contradictions within this space have begun to open up. Women at strike from the house work are now an active part of the community at large, the pulse of resistance here beats fast and hard in the occupied zone, the women’s autonomous agency has been upheld here.
  • This marks a firm forward step made by the resistance of the working mass forsaking all the former futile forms of protests — rallies, demonstrative strikes, speeches etc. —  that are constitutive of spectacle politics. Shaheen Bagh screams out loud and clear: “The city is a factory, we must shut it down!
  • The workers of Delhi know well that using the politics of this law, Shah and Modi, the biggest contractors of the country, want to strengthen the hand of management and contractors. Which is why the movement against this law can sweep not only through all of Delhi, but also through the neighboring industrial areas.Which is why the worried contractors of Indian state power are busy trying to use their army and their media to declare this movement as the movement of terrorists and infiltrators.
  • It is also significant that the snake that is capitalism, having shed its old skin, its old ideological form (the so-called liberal democracy), has put on a new skin (the dictatorship of neo-liberal capital). This transformation in the ideological form of capitalism has deepened not only the danger that we face, but also the one facing the state power. So, the state is trying to hide its powerlessness through counter-mobilization that is apparent in the barbaric attacks of the RSS/ the police/ the army.
  • Nonetheless, the multitudinous nature of this movement has not only undone the designs of the state, but has also put a question mark against the very idea of ‘citizenship’, which in turn shows that the form of the ‘nation-state’ is itself in a state of existential crisis. 
  • However, while the movement is bringing the very idea of ‘citizenship’ into question, the leaders and organizations, trying to lead the movement, are repeatedly trying to pull it back into the fold of ideas of ‘citizen’ and ‘people’.
  • The movement has made it patently clear that politics that bases itself on the idea of ‘citizen’, willy-nilly, carries within it the idea of the ‘non-citizen’, of ‘infiltrator’, and thus is an anti-working class politics.
  • Why is it that the so-called revolutionary political and ideological forms are still unable to conceive of politics outside of the ideas of ‘citizen’ and ‘the people’?
  •  Is this so because the nation-state remains at the center of their politics?
  •  Do they want to unsee the imperialist character of the Indian nation-state because they want to capture this state at some point? That they too want to be imperialists someday!
  • In this sense the movement is anti-imperialist in its very being.
  • Beyond the duality of citizen-infiltrator, beyond the grounds of the nation state, what this movement demands is not the imposition of political or national self- determination, but seeks to pose the question of social self-determination beyond the grounds of the nation-state, a working class revolution in South Asia, i.e., the post-national proletarian revolution.

शाहीन बाग़ की ओर से एक और अपील…

फोटो: द वायर से साभार

खुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं…

शाहीन बाग़ का पिछला पखवारा नए मुकामों का गवाह है और हौसले से भरा है. एक बुतशिकन हौसला! राजनीति के सारे लिबरल-वाम रूप इस हौसले में टूट रहे हैं. वोटों वाली जम्हूरियत कितनी घिनौनी और बर्बर हो सकती है यह अब परदे के पीछे की बात नहीं है. राज्य-सत्ता की हिंसक आत्मा सड़कों पर बच्चों का एनकाउंटर कर रही है. दुनियाभर के आन्दोलन जम्हूरियत की दूसरी और दबा दी गयी रवायतों की खोज-बीन कर रहे हैं. नई रवायतें बना रहे हैं. शाहीन बाग़ ऐसी रवायतें बनाने वालों के साथ है. जिस तरह जमायत और जुमे की फ़ितरत कश्मीर के आन्दोलन में बदलती गयी वैसे ही यहाँ भी बदल रही है. जमायत के अवसरवादी नेतृत्व से लगातार संघर्ष करते हुए धीरे-धीरे समूचे समाज की ख़ुदमुख्तारी और फैसलों के नए तरीके खोजे जा रहे हैं. उन्हें लागू किया जा रहा है. पैसे की दुनिया आदमी को अकेला करती है. दरअस्ल हरेक के भीतर की सामाजिक शख्सियत को दबा कर ही पैसे की दुनिया हमें अकेला करती है. शाहीन बाग़ इस दबा दी गयी सामाजिक शख्सियत के उभार का मौका बना है. आपसी सहयोग और मिलजुल कर जीवन जीने की नई कोशिशें तेज हुई हैं. घर और बाहर के रिश्ते बदल गए हैं. बेटे अब मम्मियों को फ़ोन कर घर आकर थोड़ा आराम कर लेने ही हिदायतें देने लगे हैं. किरायेदारों के किराए माफ़ किये जा रहे हैं. कॉर्पोरेट कंपनियों में काम करने वाले नौजवान देख रहे हैं कि नौकरी छीनने और बन्धुआगिरी कराने के लिए ही डिटेंशन कैम्प बनाये जा रहे हैं और उन्हें ‘मुसलमान’ पहचाना जा रहा है. अपनी अपनी ज़मीन से उखड़े और सारा जीवन किराए पर गुज़र करने वाले कामगार बाशिंदों ने कब्ज़ा नहीं हटाने की ठान रखी है. सब कुछ नए सिरे से गढ़ने का हौसला बढ़ा है. आग जल रही है.

पर सामने मुश्किलें कम नहीं हैं. शहर एक कारखाना है और इसे बंद करना है. मतलब साफ़ है कि कारखाने की दूसरी यूनिटों का चक्का जाम भी होना चाहिए. समय की मांग है:- चक्का जाम, आपसी सहयोग और जमायत के नए तरीकों की मशकक्त. ज़रूरी है हम शाहीन बाग़ के इर्द-गिर्द फैलें. लोगों से बातें करें. उन्हें अपनी मशक्कत में शामिल करें. जमायत के नेटवर्क कायम हों. सड़कों और दफ्तरों और कंपनियों पर कब्जे की सामूहिक कोशिशें तेज हों. हौंडा के ठेका-मजदूरों ने पिछले डेढ़ महीनों से कंपनी पर कब्ज़ा जमाए रखा है. कश्मीर की तरह हड़ताल और जमायत की उनकी सीख हमारे काम की है. औरतों का अपना दल बने. घर-घर घूम कर घर-बाहर की लड़ाई में शामिल होने की अपील हो. अपील के पर्चे-पोस्टर हों. दीवारें दुनिया को आज़ादी का पैगाम पहुँचाएँ. हम कश्मीर, फिलिस्तीन, रोजोवो और रोहिंग्या की लड़ाई के साथ हैं. हम हद और बेहद दोनों से परे अनहद दुनिया के पैरोकार हैं. हम सरहदें नहीं चाहते. दुनिया हमें देख रही है. आइये छोटे-छोटे दल बाँध कर पानी की तरह आसपास फैल जाएँ. इस शहरी कारखाने को ठप्प कर दें. जामियानगर, जसोला, ओखला आदि इलाकों के कामगार बाशिंदे आपसी बात-बहस और चर्चा तेज करें. शाहीन बाग़ को जीवन का हिस्सा बनाएं. आन्दोलन की जगह पर आना-जाना तेज हो. शाहीन बाग़ का ज़िन्दा विस्तार हो.

आओ हर दिन को जुमे का दिन बना दें! शुक्रिया.

शाहीन बाग़ की ओर से… एक अपील…

नापैद तिरे बहर-ए-तख़य्युल के किनारे

पहुंचेंगे फ़लक तक तिरी आहों के शरारे….

पिछले नौ दिनों से शाहीन बाग़ दिल्ली में CAA-NRC विरोधी आंदोलन का सबसे प्रभावशाली गढ़ बना हुआ है. समय की मांग है कि हम अपने इस गढ़ को न केवल बनाये रखें बल्कि दिल्ली के हर इलाक़े में एक शाहीन बाग़ उठ खड़ा हो. सत्ता चाहती है हमें डराना, तोड़ना, कमज़ोर करना. हम चाहते हैं सारी दिल्ली में फ़ैल जाएँ. हर जगह हज़ारों रंग के फूलों की तरह खिल उठें. हर गुंचे में शाहीन बाग़ बन कर.

जिस दिन जामिया में पुलिस का नंगा नाच हुआ उसी दिन से शाहीन बाग़- शाहीन बाग़ बन गया. कालिंदी कुंज मेट्रो से लेकर नोयडा, फरीदाबाद और दिल्ली को जोड़ने वाली सड़क का 3 किलोमीटर का फैलाव बैरिकेडों से घेर दिया गया. सड़क पूरी तरह ठप्प कर दी गयी. जो बैरिकेड पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने के लिए लगा रखी थी उस पर लोगों ने कब्ज़ा किया और पुलिस को रोकने के लिए-जन-घेरेबंदी के लिए इस्तेमाल कर लिया. यह शुरुआत थी आंदोलन के नए चरण की, नए रूप की. केवल प्रदर्शन और जुलूस से आगे निकल कर शहर पर कब्जे की तरफ. पुलिस और सत्ता की रणनीति को ध्वस्त करते हुए सचमुच के जनतंत्र का क्रियान्वयन! सचमुच का कश्मीर दिल्ली के सीने में धड़कने लगा. इलाक़े के नौजवानों के साथ आ खड़ी हुईं औरतें. औरतों ने संभाल ली कमान. मंच बना और मंच के इर्दगिर्द इलाक़े के कामगार-बाशिंदों ने डेरा डाल दिया. शिफ्टों में लोग पहरेदारी करने लगे. सामूहिक सहयोग का अपनापा लोगों को बाँधने लगा. रात और दिन मिल कर एक हो गए. हरेक बैरिकेड पर नौजवानों के हिरावल दस्ते हर किस्म के दमन, अफवाह और RSS के गुंडों से शाहीन बाग़ ही हिफाज़त के लिए जमे हुए हैं. बड़े-बड़े शो-रूम बंद हैं. लोग कहते हैं कि यह सड़क दिल्ली की किडनी है- फिलहाल फेल है. गुडगाँव और फरीदाबाद की कम्पनियाँ रूक गयी हैं. मिडिया चुप्पी साधे है. पर हड़ताल जारी है. खाना-पीना, सोना-जागना, हँसना-गाना, बात-बहस जारी है. आज़ादी के तराने हवा में गूँज रहे हैं. नेता और पार्टियाँ हलकान हैं. लोग स्वयं संगठित हैं. कोई नेता नहीं- केवल कामगार बाशिंदे. तैयार हैं लोग लाखों कि संख्या में कभी भी इकठ्ठा होने के लिए. शाहीन बाग़ की जुझारू औरतों को सलाम- जबतक ये हैं हमारा आन्दोलन कमज़ोर नहीं हो सकता.

दिल्ली के कामगार-बाशिंदे जहाँ कहीं भी हैं- चाहे वो सीलमपुर में हों, चाहे गोविन्दपुरी में, चाहे पुरानी दिल्ली में या वजीरपुर में, चाहे जामियानगर में हो या मुनिरका में, चाहे बदरपुर हो या कापसहेड़ा या निजामुद्दीन- अपनी-अपनी जगह पर कब्जे की लडाई को तेज करें. शाहीन बाग़ को मजबूत करें. कब्ज़ा और सामाजिक हड़ताल. चक्का जाम और आपसी सहयोग. शहर रुकेगा नहीं तो मोदी-शाह झुकेगा नहीं! लडाई की रणनीति बनाएं. आप सब का खैर-मकदम करने को, अपने अनुभव बांटने के लिए शाहीन बाग़ तैयार है….एक नयी सुबह की आशा में! शुक्रिया!