(Citynotes Collective की तरफ से कोशिश है कि मजदूरों के अनुभव उनकी अपनी भाषा में ही यहाँ रखे जाएँ. सामान्य व्याकरण के अनुरूप न होते हुए भी अनुभव की लय और उसकी उधेड़बुन भाषा में लक्षित है. दूसरे और मजदूर साथी आपातकाल में अपने कामकाजी सम्बन्धों और उसमे होने वाले घर बाहर के अनुभवोंं को साझा करना चाहें तो हमसे संपर्क कर सकते हैं. अनुभवों का यह साझा किया जाना ‘वर्कर्स इन्क्वायरी और वर्कर्स सेल्फ इन्क्वायरी’ की राजनीतिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है. आगे हम इसे और स्पष्ट करने की कोशिश करेंगे. महामारी के बीच सामूहिक कार्यवाही के संगठन के लिए ज़रूरी आपसदारी के लिए … )

अभी हम एक ऐसे हालात में हैं जब कोरोना के वजह से लगभग सारी कम्पनीज जहाँ ‘वर्क फ्रॉम होम’ संभव था ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने को कह दिया. ‘वर्क फ्रॉम होम’ऐसे कोई नई बात तो है नहीं, ये पिछले कई सालों से चलती आ रही है. लोग अलग-अलग जगह एक्सपेरिमेंट कर रहे थे इसके बारे में अब तो कोरोना ने लोगों को फ़ोर्स कर दिया ये करने पर, लेकिन सवाल ये भी पैदा होता है किस कीमत पर? सवाल तो और भी कई पैदा होते हैं – जैसे कंपनी पर क्या प्रभाव पड़ेगा , मजदूर के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पुरे व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा,भाविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा और क्या कोई भाविष्य है भी?

लोग आशा कर रहे हैं सब कुछ सही होगा, वर्क फ्रॉम होम पर ज्ञान दे रहे हैं, लोग ये भी ज्ञान दे रहे हैं कि वर्क फ्रॉम होम में प्रोडक्टिव कैसे हुआ जाए या पागल होने से कैसे बचा जाए? क्या हम नहीं चाहते थे कि ऑफिस से छुट्टी मिले, लो मिल गयी छुट्टी! अब भी दुखी है, अब भी पागल हो रहे हैं, क्यों हो रहे पागल? क्योंकि मजबूर होकर घर से काम करने और खुद की मर्ज़ी से घर से काम करने में फर्क होता है? बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, बहुत सारे कारण हैं, भाविष्य अनिश्चित है, लेकिन भाविष्य तो बिना कोरोना के भी निश्चित नहीं थी, चीजें सबकुछ वही है जो पहले थी अब बस खुल कर सामने आ रही हैं दिख रही हैं, हाँ चीजें ख़राब थी, कोरोना ने उसकी गति थोड़ी बढ़ा दी है ये अलग बात है, लेकिन कुछ नया नहीं किया है.

कोरोना के आने से पहले से ही फ्रीलांसिंग और वर्क फ्रॉम होम लगातार बढ़ता जा रहा था, कोरोना वायरस ने इस ट्रायल को भी समय दिया है. अब वो और तेज़ी से बढ़ेगा अगर कुछ बचता है. पिछले पंद्रह सालों में वर्क फ्रॉम होम तीन गुना बढ़ा है. 2016 में एक पेपर पब्लिश हुआ था – “Does Working From Home Work” इसमें कुछ लोगों पे एक्सपेरिमेंट किया गया, पहले तो सब कुछ सही था कंपनी ऑफिस में जो स्पेस देती थी उसकी वजह से और कुछ अन्य कारणों से कॉस्ट सेविंग भी हुई, लेकिन लोगों की एक प्रॉब्लम थी – स्ट्रेस, अकेलापन. ये तो उन लोगों के लिए जिनके लिए वर्क फ्रॉम होम संभव था और उन्होंने पहली बार नहीं किया, अभी कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनके लिए संभव था लेकिन उन्होंने कभी ट्राई नहीं किया, उनके लिए ये समय और ज्यादा चैलेंजिंग हो गया, कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनके लिए वर्क फ्रॉम होम संभव नहीं था, कुछ लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया, कुछ लोग पे कट के साथ अभी कंपनी के साथ है लेकिन कभी भी निकाले जा सकते हैं, उन सबकी भी एक कॉमन समस्या है – स्ट्रेस, अकेलापन,नौकरी जाने का डर.

ये नौकरी जाने का डर जो है वो इससे पहले अब तक ऐसा नहीं था, लगता था कि यहाँ से जब निकलेंगे तो किसी और कंपनी में तो चले ही जाएंगे, लेकिन अभी तो वायरस पूरे सिस्टम में इस तरह घुस गया है कि कुछ भी स्टेबल नहीं है बड़े-बड़े ज्ञानी लोगों को पता नहीं है कि कब चीजें नार्मल होंगी या होंगी भी कि नहीं. कंपनी के सीनियर लीडर्स के मेल्स अभी बहुत फ्रीक्वेंट आते है, हमें जोश में लाने की और लगातार काम करते रहने की बात ही होती है अधिकतर में तो. कंपनी में ऊपर बैठे जो लोग हैं उन्होंने अपने सैलरी का 25% कम कर दिया है अभी के लिए, हो सकता है आगे जाके हमारी भी सैलरी कम की जाए जब तक कंपनी पूरे तरीके से ठप्प नहीं हो जाती है. कुछ कम्पनीज में तो काम बढ़े हैं, कुछ कम्पनीज के स्टॉक्स बढ़ रहे हैं अमेज़न के स्टॉक अपने बेस्ट पर हैं अभी, अभी तो चीजें जस्ट स्टार्ट हुई हैं, लेकिन जब बाकी कम्पनीज गिरेंगी तो अमेज़न पर भी उसका प्रभाव तो पड़ेगा ही, अमेज़न जैसी बड़ी कुछ कम्पनीज से इंटरव्यू के कॉल भी आ रहे हैं लेकिन जब ले-ऑफ होता है तो सबसे ज्यादा प्रभाव ऊँचे पद पर जो लोग हैं,जिनकी सैलरी ज्यादा होती है उनको होता है या फिर जिन्होंने जस्ट कंपनी ज्वाइन किया है इसलिए लोग रिस्क भी नहीं ले रहे कि कंपनी बदली जाए, मामला सिर्फ एक वर्कर या एक कंपनी तक ही सिमित नहीं रह गया जहाँ एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जाकर हम-आप सुरक्षित महसूस कर सकें, ये तो पूरी व्यवस्था ही खतरे में है!


पहले वर्कर्स एक फिजिकल वर्कस्पेस में मिलते थे, सहकर्मी के साथ चाय पीते हुए थोड़ा वक्त बिताते थे, इधर-उधर की बात करते थे वो अब पूर्ण रूप से घर से काम कर रहे हैं. मैनेजर जब ऑफिस में होता था, लोगों को काम करते देखता था बड़ी आसानी से मैनेज कर पाता था , साथ काम करने वाले भी साथ-साथ ट्रैक पर होते थे वो वर्चुअल हो गया है जिससे काम के साथ-साथ मीटिंग्स की भी इंटेंसिटी बढ़ गयी है, मीटिंग्स का ड्यूरेशन बढ़ गया. इन सारी दिक्कतों में नार्मल ऑफिस गॉसिप करने को भी कोई है नहीं तो उसकी अपनी अलग दिक्कत है. साथ-ही-साथ काम करने का वर्कर्स के बीच एक कम्पटीशन भी था जिससे एक को काम करते देख दूसरा भी काम करने के लिए फोर्स्ड रहता था या कह सकते हैं फॉर्सेली फोकस्ड रहता था. बाकी लोगों के साथ एक फिजिकल वर्कस्पेस में काम करना ज्यादा आसान होता था, यहाँ लोगों से बातचीत करने के लिए ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ता था, जब भी कोई दिक्कत होती जाकर आसानी से प्रोब्लेम्स डिस्कस कर लेते थे और मन भी लगा रहता था अब वो भी ख़त्म हो गया. काम करने के साथ-साथ बाकी लोगों के बीच तालमेल बिठाते रहने के लिए भी एक्स्ट्रा एफर्ट लगाना पड़ता है, लेकिन अब जब सब वर्चुअल हो गया है, सब ऑनलाइन हो गया है, तो मैनेजर के मेल्स का रिप्लाई करने में थोड़ा डिले भी किया जा सकता है और काम की डिपेंडेंसी होने से टीम के बाकी लोग जो हमें और हम उन्हें मैनेज करते थे अब वो भी थोड़ा स्लो किया जा सकता है, बीच-बीच में पावर नैप भी लिया जा सकता है, लेकिन उसकी भी अपनी अलग दिक्कतें हैं. अभी भी काम लगातार किया जा रहा है, अगर कोई नया काम नहीं भी आ रहा हो तो पुराना काम करो जिनकी प्रायोरिटी कम थी और किसी हाई प्रायोरिटी के काम की वजह से जिन्हे किनारे कर दिया गया था या जिसको करने से थोड़ी कॉस्ट सेविंग की जा सकती है- जहाँ-जहाँ चीजों को ज्यादा ऑटोमेट किया जा सकता है वहां किया जा रहा है, उसपे काफी फोकस किया जा रहा है, जिससे लीडर्स को लगे कि हम काम कर रहे और हमें निकाल के नुकसान हो सकता है कंपनी का या फिर वर्कर्स आलसी ना हो जाए घर बैठे-बैठे कल जब सब नार्मल हो तो वो पहले वाली इंटेंसिटी से ही काम करे, इन कामों की भी डेडलाइन है, तो जब आप पावर नैप लेते भी हैं तो भी काम को पूरा तो करना ही है अगर नहीं कर पाए तो जवाब देना है मीटिंग्स में, आप जग कर फिर काम में लग जाते हैं, ओवरआल काम करने का घंटा तो वही है, अब वो स्कैटर्ड ज्यादा है साथ-साथ मीटिंग्स के घंटे बढ़ गए हैं, अमेज़न में काम करने वाली एक दोस्त का कहना है कि रोज़ उसके 4 से 5  घंटे मीटिंग्स में ही निकल जाते हैं जब वो और उसके कुछ दोस्त मैनेजर से समय को लेकर कम्प्लेन भी करते है तो मैनेजर को ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता, कंपनियों में कुछ-कुछ टीम्स में काम काफी ज्यादा बढ़ भी गया है तो मैनेज करना खुद के लिए थोड़ा मुश्किल हो गया है. जिनके टीम में काम नहीं बढ़ा है वो डरे हुए हैं कि कल को निकाल ना दिए जाए.

एक बेचैनी बढ़ी ही है क्यूंकि जो काम हम कर रहे हैं वो कब तक जॉब को बचा के रख पायेगा हमें खुद नहीं पता इस बेचैनी में काम पर फोकस भी नहीं बन पा रहा है काम करने का मन भी नहीं हो रहा और अकेलापन तो है ही, तो जो काम कल तक नार्मल भी लगता था अब वो भी ज्यादा लगने लगा, काम जितना ज्यादा लग रहा है, अकेलापन और बेचैनी उतनी ज्यादा बढ़ भी रही है वो फिर काम को और और ज्यादा कर दे रही और इस तरह हम एक लूप में फंस गए लगते हैं.

प्रोफेशनल जीवन के साथ-साथ पर्सनल जीवन पर भी काफी प्रभाव पड़ा है. पहले घर का एक काम होता था, ऑफिस का अलग काम होता था दोनों अलग-अलग दीखते थे. कुछ काम हम करते थे कुछ कामों के लिए किसी और पर डिपेंडेंट रहते थे जिससे कि ऑफिस का काम अच्छे से कर पाएं. जितने लोगों पे डायरेक्टली डिपेंडेंट थे जैसे की सफाई करने वाले, खाना बनाने वाले, घरेलु सामान लाने वाले, चाय सिगरेट की दूकान वाले.. अब आसपास कोई है नहीं. इनमे से अधिकतर लोग या तो अपने घर चले गए, या तो अपनी दूकान नहीं खोल पा रहे, घर से बाहर नहीं निकल पा रहे तो ये पूरा काम भी हमें खुद करना पड़ रहा है जिसमे 4-5 घंटे रोज़ के बर्बाद होते हैं और इसका सीधा प्रभाव हमारे ऑफिस के काम पर भी पड़ रहा है, उसकी अपनी अलग टेंशन होती है. ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर, दिन में कई दफा चाय, पूरे घर की सफाई, बर्तन की सफाई, समय से दूकान खुलने का इंतज़ार करना और जब खुले तो जल्दी से जाकर सामान लाना, कूड़े वाले का इंतज़ार करना जब आये तो कूड़ा देने जाना, घर आर्गनाइज्ड रखते रहना की कल को इतना डिसआर्गनाइज्ड ना हो जाए की उसका अलग स्ट्रेस हो जाए, इतने सारे कामो के बीच-बीच में ऑफिस का काम भी.

कोरोना ने ये जो पूरा चेन था जिसमे लोग आपस में कनेक्टेड थे उसको भी एक्सपोज़ किया है, इस पूरे सिस्टम में कुछ मजदूरों ने अनचाहे काम करना बंद कर दिया. वो जो हमारा काम करते थे वो हमें खुद करना पड़ रहा है, और हम कब तक ये कर पाएंगे वो नहीं पता, पूरा सिस्टम डिसरप्ट होता हुआ दिख रहा है.

इसी बीच स्कूल/कॉलेज के पुराने दोस्तों से बातचीत, कई सारे दोस्त जो कहीं बाहर चले गए थे अपने जीवन में व्यस्त हो गए थे अचानक से फेसबुक/व्हाट्सप्प पर एक्टिव हो गए, कॉल करने लगे बातचीत भी लम्बी होने लगी, कब के बिछड़े लोगों से बातचीत होने लगी, काफी लोगों को काफी वक़्त भी मिलने लगा ये बात अलग है कि हमारे पास समय हो ना हो हम भी बातचीत करने लगे क्योंकि अभी जो बेचैनी हो रही उससे ध्यान थोड़ा भटकाने का मौका भी मिल रहा है, नेटफ्लिक्स एंड चिल भी कब तक ही करेगा कोई उससे भी लोग बोर होने लगे तो इसमें काम के साथ-साथ एक इमोशनल संकट से भी गुजर रहे हैं हम. पुरानी बातचीत फिर से शुरू कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर पहले से ज्यादा समय बिताने लगे, सोशल मीडिया पर कई अलग तरह के एक्टिविटीज शुरू हो गए जैसे की अलग-अलग तरह के हैशटैग चैलेंज, कुकिंग की फोटो डालना, या फिर सोशल मीडिया पर दोस्तों के साथ वीडियो कॉल की स्क्रीनशॉट डालना इत्यादि.

कोरोना ने हमें ये एहसास दिला दिया कि हम काफी अकेले हो गए हैं, अकेले तो हम कोरोना से पहले भी थे, पहले भी ये एहसास कभी-कभी होता था, लेकिन अब ये एहसास करने को भी काफी समय मिल रहा है.

जिनकी शादी हो गयी है या जिनको फैमिली में रहना पड़ रहा है उनकी अपनी अलग दिक्कत है. पहले जब ऑफिस होता था तब अलग-अलग जगह समय बिताने का मौका मिलता था, 8-10 घंटे ऑफिस में, 1-2 घंटे ट्रेवल में, 6-7  घंटे सोने में, और बाकी 1-2 घंटे बाकी दैनिक काम करने में निकल जाते थे तो बाकी बचा हुआ काफी कम समय फैमिली में बिताते थे. कई जगह जहाँ पति-पत्नी अलग-अलग जगह काम करते थे वो तो ढंग से वीकेंड पर ही मिल पाते थे, लेकिन अब जब पिछले एक महीने या उससे ज्यादा समय से हम सब साथ में हैं, अलग-अलग तरह के संकट में हैं, स्ट्रेस्ड हैं तो फैमिली का टूटना भी काफी हो रहा है, कहीं-कहीं पति-पत्नी में विवाद बढ़ रहे हैं, बच्चों के प्रति भी हिंसा के केसेज ज्यादा बढ़े हैं, बच्चों का अपने माता-पिता से भी थोड़ा तनाव हो रहा है. एक दिन मेरी एक सीनियर मीटिंग में कॉल म्यूट करना भूल गयी और उनका झगड़ा हमें भी सुनाई दे रहा था, या फिर मेरे सहकर्मी का एक दिन मेरे से बात करना कि घर पर उसका सबसे झगड़ा हो रहा है, वो चाहती है कि फिर से सब शुरू हो और घर पर जितना पहले समय बिताती थी उतना ही बिताये, हमारा ‘होम’ से जो सम्बन्ध ‘वर्क फ्रॉम होम’ से पहले था ‘वर्क फ्रॉम होम’ ने उसको भी क्लियर कर दिया है,

ये समझने का मौका दे दिया है कि वर्क और होम कितना अलग था? या क्या वो अलग था भी? समस्या है कहाँ वर्क में, होम में, कोरोना में, ‘वर्क फ्रॉम होम’ में या कहीं और?

क्या हमें ये नहीं लगता कि अगर हम वापस पीछे लौटते भी हैं तो सबकुछ वही रहेगा. हम जब बोलते हैं कि सब कुछ पहले जैसा हो जाए तो वहां पहुंचने की कोशिश में हम बस यहाँ से भागने की ही कोशिश कर रहे हैं क्योंकि अभी जो हो रहा है वो हमें पहले से ज्यादा बुरा लग रहा है. समय ज्यादा मिल रहा है परिवार के साथ, भाविष्य और पूंजी का संकट दिख रहा है. पूंजी का संकट, पूंजीवादी व्यवस्था का जो संकट है उससे अछूता तो फैमिली रह नहीं सकता.

कंपनियों के भाविष्य पर क्या प्रभाव होगा वो अपने आपको कितना बचा पाती हैं, हम अपनी नौकरी बचा पाते हैं या नहीं ये बाद की बात है, मान लेते हैं 2021 में बेस्ट(वर्स्ट) केस में सब कुछ सही हो जाएगा, फिर से जीवन शुरू होगा, फ्राइडे नाईट फिर आएगा, मंडे ब्लूज फिर आएगा, लेकिन कोरोना ने जितना समय कंपनियों को दिया है उतना ही समय हमें भी दिया है, ‘वर्क फ्रॉम होम’ पर जितना एक्सपेरिमेंट वो चाहे-अनचाहे कर रहे हैं उतना एक्सपेरिमेंट हम भी कर ही रहे हैं. बहुत सारी चीजें खुल के आ रही हैं जिसका डायरेक्ट- इनडायरेक्ट रिजल्ट अभी दिख रहा है, स्ट्रेस देख पा रहे हैं, एंग्जायटी महसूस कर रहे हैं, आइसोलेट हो रहे हैं, प्रोडक्टिविटी और खुद को बहलाने के नाम पर अलग-अलग एक्टिविटी कर रहे हैं. समय है थोड़ा रूक के प्रोडक्टिव होने का, कुछ ना करके प्रोडक्टिव होने का, या फिर जब समय ही नहीं है तो प्रोडक्टिव हो ही क्यों रहें हैं ?

कोरोना ने काफी वक़्त दे दिया है सोचने को कि हम जिस व्यवस्था में प्रोग्राम्ड हो गए थे ये उसकी संकट है, फटनी तो इसको थी ही आज नहीं तो कल. ये संकट कोरोना ने पैदा नहीं किया है कोरोना ने इस व्यवस्था को नंगा करने का काम किया है, एक बड़ा समय स्किप करके सीधे-सीधे हमें भाविष्य में ले आया है जहाँ ये संकट आना ही था!

असल पैनडेमिक ये पूंजीवादी व्यवस्था है. जरुरत सिर्फ कोरोना के जाने की नहीं है, कोरोना के साथ-साथ इस पूरे व्यवस्था को ही जाना होगा. अगर अभी भी ये व्यवस्था खुद को किसी तरह बचा ले पाती है तो ये और barbaric/बर्बर होने वाला है!

The real antidote of this pandemic is communism!