Indians bang utensils outside their home to cheer essential workers. (Photo Courtesy: Al Jazeera, Mahesh Kumar A.)

(Citynotes Collective की तरफ से कोशिश है कि मजदूरों के अनुभव उनकी अपनी भाषा में ही यहाँ रखे जाएँ. सामान्य व्याकरण के अनुरूप न होते हुए भी अनुभव की लय और उसकी उधेड़बुन भाषा में लक्षित है. दूसरे और मजदूर साथी आपातकाल में अपने कामकाजी सम्बन्धों और उसमे होने वाले घर बाहर के अनुभवोंं को साझा करना चाहें तो हमसे संपर्क कर सकते हैं. अनुभवों का यह साझा किया जाना ‘वर्कर्स इन्क्वायरी और वर्कर्स सेल्फ इन्क्वायरी’ की राजनीतिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है. आगे हम इसे और स्पष्ट करने की कोशिश करेंगे. महामारी के बीच सामूहिक कार्यवाही के संगठन के लिए ज़रूरी आपसदारी के लिए … )

यह एक मल्टीनेशनल कंपनी है। मोबाइल, टीवी, अन्य इलेक्ट्रॉनिक माल का उत्पादन होता है। बड़ी कंपनी है; विभिन्न डिपार्टमेंटों में (ऑन रोल और ऑफ रोल मिलाकर) कुल मिलाकर  3 लाख से अधिक वर्कर काम करते हैं। ‘क’कम्युनिकेशन्स डिपार्टमेंट में काम करता है। जबसे लॉकडाउन है, वह वर्क-फ्रॉम-होम यानि घर से काम करता है।  

लॉकडाउन में काम बदल गया है और पहले से कहीं ज्यादा तीव्र हो गया है; या शायद ज्यादा महसूस होने लगा है। पहले भी काम का दबाव कम नहीं था पर अब कहीं ज्यादा स्पष्ट रूप से महसूस होने लगा है। पहले, हफ्ते में 5 दिन ऑफिस जाना होता था और काम आसानी से मैनेज हो जाता था। एक घंटे का सफर तय कर, मैं बाकी सहकर्मियों से आधा-एक घंटा पहले ही दफ्तर पहुंच जाया करता था। जबतक बाकी सहकर्मी आते, तबतक मैं ईमेल से सम्बंधित काम का एक बड़ा हिस्सा ख़त्म कर चुका होता था। ऐसे में मैं पूरे दिन काम के दौरान चाय ब्रेक लेता और ‘रिलैक्स्ड’ तरीक़े से काम करता। ऑफिस से निकल कर चाय पीओ, लोगों से मिलो, बातें करो, फिर लंच, फिर काम, फिर चाय, फिर छुट्टी। आम तौर पर काम दफ़्तर तक ही सीमित रहता था, यानि वर्क-फ्रॉम-होम की ज़रूरत नहीं थी।

काम के घंटे तय थे। काम के बाद आप फ्री होते थे, पर कुछ करने की एनर्जी नहीं बचती थी, सीधा घर आकर आराम करो, खाना खाओ और दिन ख़त्म। कहीं बाहर जाना व्यावहारिक नहीं था क्योंकि अगले दिन सुबह उठकर फिर काम पर जाना होता था। वीकेंड की छुट्टी होती थी। पूरे हफ्ते काम करते-करते  सोचता कि वीकेंड के दौरान मज़ा किया जाएगा, दोस्तों के साथ घूमने जाऊंगा, पुराने दोस्तों से मिलूंगा। पर शुक्रवार आते-आते इतना थक जाता था कि छुट्टी के दिन कहीं बाहर जाने या मस्ती करने की हालत ही नहीं बचती थी। छुट्टी के दो दिन भी अक्सर घर पर ही आराम करने में निकल जाते। और आराम करना भी कोई आसान बात है क्या ? मन कहता है कि आज तू कुछ घंटे ज्यादा सो ले; आज तू बस सोते रह। पर देह धोखा दे देती है। हफ्ते में 5 दिन एक फिक्स्ड समय पर उठकर शरीर की आदत भी फिक्स हो गई है। मशीन जैसी हो गई है। सुबह 6बजे अपने आप आँख खुल जाती है जैसे कहीं जाने की जल्दी हो। मन कहता है और सो ले। लाख कोशिशों के बाद भी बस करवटें बदलता रहता हूँ और हार कर उठना ही पड़ता है। घर के किसी काम में लगना ही पड़ता है नहीं तो बेचैनी होने लगती है। अब तो घर ही दफ्तर है। काम पर जाने और लौटने का सफर तय नहीं करना पड़ता जिससे दो घंटे एक्स्ट्रा मिल जाते हैं। पर अब काम के घंटे और छुट्टी के घंटों में फर्क करना और मुश्किल हो गया है। 

लॉक डाउन में काम से जुड़ी परेशानियां दो मुख्य कारणों से बढ़ गई है। पहली, घर के काम और ऑफिस के काम में तालमेल बनाने से जुड़ी है और दूसरी काम के स्वरूप के बदलने से। लॉक डाउन से पहले ऑफिस में काम का माहौल बनता था। अगल-बगल के सहकर्मी काम में व्यस्त होते थे, ताल-मेल बनाकर काम करते थे, काम में फोकस रहता था। बनी बनाई चाय मिलती थी; दोपहर को बना बनाया खाना। एक तो आजकल समय पर न सोया जाता है और फिर सुबह देर से काम शुरू होता है। दोपहर तक काम गति पकड़ता है और तभी लंच का समय आ जाता है। यह सोचने में कि क्या बनाया जाए, इसी में बहुत समय बीत जाता है और काम में फोकस करना मुश्किल हो जाता है। फ्रिज खोलो, देखो क्या-क्या पकाया जा सकता है, घर में रह रहे साथियों से सलाह करो कि क्या खाना ठीक होगा, फिर खाना पकाओ, बर्तन साफ़ करो। खाना तीन टाइम बनाने से रसोई भी अधिक गंदी रहती है; अस्त व्यस्त और मैली रसोई में काम करने से दिमाग भी अस्त-व्यस्त हो जाता है और साफ़ करने लगो तो इतना समय बीत जाता है कि टेंशन होने लगती है। खाना बनाते ही, और रसोई साफ़ करने के तुरंत बाद  लैपटॉप के सामने बैठना अटपटा सा लगता है।

पहले, चूँकि सभी सहकर्मी दफ्तर में आसपास ही बैठते थे, आपस में संपर्क और तालमेल बना रहता था । अब अपनी टीम से सारी बातें फ़ोन पर करनी पड़ती है, जो बहुत थका देता है; ‘अलाइनमैंट’ मुश्किल हो गई है। और बाकी साथियों का भी यही हाल है।  फ़ोन करो तो कोई चाय-खाना बना रहा होता/होती है या कोई अपने बच्चों को संभालने में व्यस्त होता है। घर और दफ्तर एक हो गए हैं। काम के समय और अपने निजी वक्त में फर्क करना मुश्किल हो गया है।

काम बदल गया है। पहले हम मीडिया और प्रेस से जुड़े काम सँभालते थे, प्रेस रिलीज़ निकालते थे, एडवरटाइजिंग/विज्ञापन से जुड़े काम करते थे, कंपनी की बाकी शाखाओं जैसे मार्केटिंग, सेल्स आदि को गाइड करते थे। अब मीडिया-प्रेस ठप्प है, कंपनी में प्रोडक्शन बंद है, सेल्स बंद है, मुख्य डिपार्टमेंट ठप्प हो गए हैं। कंपनी ने 2020 को ज़ीरो-ईयर घोषित कर दिया है। यानि इस साल कोई मुनाफा, विभिन्न रूप का डेटा या अन्य लॉजिस्टिक रिपोर्ट रिकॉर्ड नहीं की जाएँगी। समझ लो, भविष्य में जब कंपनी का इतिहास रिकॉर्ड किया जाएगा, उसमें यह साल गायब होगा।

हज़ारों वर्करों के काम ‘इर्रेलेवेंट'(असंगत) और निरर्थक हो गए हैं। अगर लॉकडाउन बरक़रार रहा तो कंपनी कब तक वर्करों को सैलरी देती रहेगी ? सुना है ज़्यादा से ज़्यादा 6 महीने तक ही दे पाएगी। उसके बाद छंटनी शुरू हो सकती है। अब सवाल है कि किसको निकाला जाएगा और कौन बचे रहेंगें ? यह डर सब के मन में बैठा हुआ है।

प्रोडक्शन ठप्प होने पर कंपनी के पास बस एक ही चारा बचा है – रिप्रोडक्शन। यानि अपने आप को, अपने उपभोक्ताओं से सम्बन्ध को और अपने वर्करों के साथ रोज़गार संबंधों को बनाए रखना और उन्हें समय के अनुसार पुनरुत्पादित करना। इस रिप्रोडक्शन की प्रक्रिया के कई पहलु हैं।                 

कंपनी के अलग-अलग डिपार्टमेंटों का अलग-अलग काम था। अब वह काम ‘इर्रेलेवेंट’ हो गए हैं।  इसलिए अब उन्हें नए काम ईजाद करने होंगे। उन्हें दिखाना होगा कि उनका काम अब भी ‘रिलेवेंट’ है। अगर ऐसा नहीं किया तो नौकरी खोने का डर रहेगा। किसी भी तरह तुम्हें कुछ काम करना होगा। चाहे उस से कंपनी का कोई मुनाफा न हो, बस कंपनी का नाम बना रहे और बाज़ार में उसकी उपस्थिति दिखती रहे। अब हमारे कम्युनिकेशन्स डिपार्टमेंट का पुराना काम बंद हो गया तो हम सोशल मीडिया पर एक्टिव हो गए। कंपनी के बड़े मैनेजरों और अफसरों के इंटरव्यू रिकॉर्ड कर इंटरनेट पर प्रसारित करने लगे। इन इंटरव्यू को लोग देखने लगे और हमारे डिपार्टमेंट का कंपनी में नाम हो गया। हमारी टीम को शाबाशी मिली। जिन्होंने इस काम की पहलकदमी की, उन्होंने अपनी ‘रेलेवंस’ साबित की, उनको बोनस भी मिला और बाकियों को नहीं मिला। नौकरी सुरक्षित हो गई।

और उदाहरण देता हूँ। कंपनी का सर्विसिंग का काम बंद हो गया है। पहले घर-घर जाकर इंजीनियर और टेक्निशन हमारे इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स की सर्विस करते थे। लॉकडाउन में यह मुमकिन नहीं था। जब हमारे डिपार्टमेंट ने उन्हें सलाह दी तो उन्होंने विडियो बनाया कि कैसे हमारे उपभोक्ता, घर बैठे अपने टीवी, फ्रिज आदि की मरम्मत खुद कर सकते हैं। इंजीनियरों ने अपनी रेलेवेंस साबित की और चैट-बोट्स बनाने में जुट गए जो पहले से कहीं ज़्यादा आधुनिक हैं। लॉकडाउन में कस्टमर-केयर पर दबाव बढ़ गया है। यह रोबोट्स इंसानों की तरह उपभोक्ताओं की समस्या हल करते हैं।

सेल्स डिपार्टमेंट का पुराना काम ठप्प है क्यूंकि बिक्री बंद है। अब उस डिपार्टमेंट के वर्करों को कंपनी को साबित करना होगा कि वह लॉकडाउन जैसी स्थिति में भी काम ईजाद कर सकते हैं यानि वो रेलेवेंट हैं। ऐसे में वह अपने ग्राहकों, वितरकों और विक्रेताओं को हर रोज़ फ़ोन करेंगें। लगातार उनसे जुड़े रहेंगें। अब वो उनकी ज़िम्मेवारी है कि वे क्या बात करेंगें – हाल-चाल पूछेंगे, लॉकडाउन खुलने के बाद की योजना बनाएंगे या कुछ और। पर उन्हें लगातार काम करते रहना होगा। कंपनी को रिपोर्ट भेजते रहना होगा। अब कोई कहे कि रोज़-रोज़ फ़ोन करने का क्या फायदा है या फिर उपभोक्ता फ़ोन नहीं उठा रहे तब कंपनी कहेगी कि यह तो तुम्हारी जिम्मेवारी है। कुछ काम करोगे तभी तो तनख्वा मिलेगी, नहीं करोगे तो कंपनी तुम्हें किस बात का पैसा दे ?

आपको कंपनी को यह एहसास दिलाना ही होगा कि तुम मन लगाकर कंपनी के लिए काम कर रहे हो; कंपनी एक परिवार है और उसकी तबियत के लिए तुम्हारा मन चिंतित है। तुम भावुक हो और इसीलिए जोश में हो। यह साबित करने के लिए आपको लगातार अपने बॉस को फ़ोन करते रहना चाहिए। तभी तो उसे यकीन होगा कि तुम सच में मेहनत कर रहे हो और तुममें लगन है और तुम्हें काम पर रखने में कंपनी को घाटा नहीं होगा।         

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कोरोना की वजह से खुद बड़ी कम्पनियाँ, बड़ी पूँजी, असंगत यानि इर्रेलेवेंट हो गई हैं। वायरस ने इन्हें ऐसा झटका दिया है कि जिस मुनाफे के लॉजिक पर उत्पादन आधारित था उसमें एक दरार साफ़ दिखाई पड़ रही है। न उत्पादन की गुंजाईश है न उपभोग की। पहले भी कंपनियों पर संकट मंडराता था, जिसमें छंटनियाँ होती, मशीनीकरण होता, कंपनियों का दिवाला भी निकल जाता था। अब संकट किसी एक कंपनी या एक पूंजीपति तक सीमित नहीं रह गया है। पहले से बीमार पूंजीवाद को वायरस ने पूरी तरह संक्रमित कर दिया है। अब सवाल है कि क्या इस बीमारी से पूंजीवाद उबर पाएगा ? अभी कुछ ठोस दावा कर पाना मुश्किल है। पर एक चीज़ साफ़-साफ़ दिख रही है कि हमारे श्रम से ही पूँजी है। हमारे काम को रेलेवेंट बनाये रखने का मतलब है कि इस महामारी में भी पूंजीवाद को रिलेवेंट बनाए रखना। यानि उस महामारी को रिलेवेंट बनाए रखना जो सारी महामारियों की जड़ है!