द क्विंट से साभार

तीस-एक साल कम नहीं होते. सामाजिक न्याय और सुशासन के तीस-एक साल! आज जब दिल्ली, सूरत, मुम्बई, तिरिपुर और श्रीनगर की दुनिया को नकार कर, अपने पैरों पर, केवल अपने बलबूते पर मजदूर आपकी सिस्टम को दुत्कार कर महा-हिजरत कर रहे हैं तो मजदूरों के मक्का और मदीने दोनों दुनियाँ की सरकारें नंगई के सिवा और क्या कर सकती है! बिहार प्रदेश अपने तीस-एक सालों के इतिहास के सामने आज भौच्चक खड़ा है. इतिहास के अंत की खिल्ली उड़ाता मजदूरों का इतिहास. गलियों और राजमार्गों को अपने हौसले और खून से रौंदता मजदूरों के इतिहास का हस्तक्षेप! ऐतिहासिक भौतिकवाद की इस ताकत के सामने सामाजिक न्यायवादियों, आरक्षण के पैरोकारों, जातिगत-ऊंच नीच के मैनेजरों की हालत खराब है और धर्मनिरपेक्षता के मसीहा को जेल से निकलवाने की जल्दी मची है. कोई तो हो जो मैनेज कर पाए! अकेले सुशासन बाबू के बस की बात नहीं रही. CAA-NRC और कश्मीर और दंगे के बाद कोरोना. पैंतरे पुराने सारे प्रकट होते देख सारी संसदीय पार्टियों की चिंता नए पैंतरों की तलाश में अतीत और भूगोल को लांघ-लांघ कर गले मिल रही हैं. आखिर पूरा का पूरा बिहार प्रदेश अपने आस-पास के विशाल भूभागों में बिखरा हुआ एक विशाल लेबर रिजर्व कैसे बनता गया? लौटते मजदूर इन सवालों के साथ लौट रहे हैं और ठेकेदारों के चाल-चलन और नियत के पुराने सारे पैंतरे समझ गए हैं. भूख के साथ तकनीक, लाठी, जेल और बन्दूक- इसकी मैनेजमेंट जिनके पास होगी वही मजदूरों को बंधुआ बना सकते हैं. न्याय और सुशासन की पुरानी मैकेनिज्म धराशायी है. आत्म-मर्यादा के नाम पर ही तो इस पूरे प्रदेश को श्रम-शक्ति का सस्ता और कठजीव श्रोत के रूप में डेवलप किया गया! इस डेवलपमेंट में हाथ बंटाने वाली ताकतें- राजनीतिक ताकतें पूरे उपमहाद्वीप में पूँजी और भारतीय-राष्ट्र को बनाये रखने के लिए ज़रूरी श्रम मुहैय्या करवाने वाली ताकतें हैं. अपने-अपने स्तर पर सारे रंगों और बैनरों ने यथार्थ की इस पुनर्रचना में भांति-भांति से सहयोग किया और कर रहे हैं. एक ओर जल-जंगल-जमीन के सामूहिक प्रतिरोध को दबाने की मैनेजमेंट और दूसरी ओर सस्ता श्रम मुहैय्या करवाने का पूँजी को कॉन्ट्रैक्ट. इनका आपसी झगड़ा दलाली और कॉन्ट्रेक्टी का झगड़ा है. कौन उत्पादन को चलाये रखने में ज्यादा कारगर है, कौन अधिशेष मूल्य के हितों को मैनेज करके दिखाता है- इसी क्रिया से तय होता है कि कौन वोट मैनेज करेगा और कैसे संसदीय लोकतंत्र अपना भ्रम जिंदा रखेगी. आज जब लाखों मजदूर सड़क पर हैं तो इन सब संसदीय पार्टियों के काम-काज का पूरा कच्चा-चिट्ठा खुल गया है. वायरस ने मनुष्यों द्वारा रचे गए मायापाश को छिन्न-भिन्न कर दिया है. ईश्वर असहाय है क्योंकि उसकी दुनिया नंगी हो गयी है. मार्क्स ने लिखा था कि इहलौकिक दुनिया की आलोचना ही स्वर्ग की आलोचना है. मजदूरों ने इस दुनिया को नकार दिया इसलिए भगवान् मारे मारे फिर रहे हैं! सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पूँजी की दलाली करती राजनीति और उसकी पार्टियाँ धर्म के पुनुरुत्थान के लिए कटिबद्ध हो रही हैं. पुराने भूतों को हवा देने में लगी हैं.

स्थिति यह है कि जिन्होंने खेतमजूरों के क्रांतिकारी नेतृत्व को स्वीकार किया था उनकी भी हालत NGO से बेहतर नहीं है. मजदूर वर्ग के साथ हमारा रिश्ता क्या रहा आया है पिछले तीस-एक सालों में? बाढ़, महामारी और पलायन. क्या इसकी गहन आत्मसमीक्षा के बिना कोई भी जनतांत्रिक आन्दोलन संभव है? दूसरे शब्दों में कहें तो इन सालों में खेतमजूरों या ‘ग्रामीण’ मजदूरों की राजनीति का उस व्यापक मजदूर वर्ग की राजनीति से कैसा रिश्ता रहा आया है जो पूँजी की दलाली, परिवेश के विनाश और सोशल इंजीनियरिंग के खिलाफ संघर्ष में बन रही थी? पूरे बिहार प्रदेश को व्यापक लेबर रिजर्व या तथाकथित ‘सोर्स’ के रूप में परिवर्तित करने में लगी ताकतों के खिलाफ हमारी राजनीति का चरित्र कैसा रहा आया है? आज जब मजदूर वापस न लौटने का संकल्प ले कस्बों, शहरों और गाँवों में उपस्थित हैं उनके सामने क्या हमें अपने पिछले तीस-एक सालों का हिसाब नहीं देना होगा? क्या मजदूरों की यह महा-हिजरत हमारी सामूहिक शर्म का कारण बनेगी? मजदूर वर्ग की राजनीति के लिए सामूहिक शर्म एक क्रांतिकारी ताकत है बशर्ते कि हममें धिक्कार का वैसा हौसला हो और आत्मालोचना की वैसी दृष्टि. मार्क्स ने इसी सामूहिक धिक्कार के बारे में रुगे को लिखा था:

“It is a truth which, at least, teaches us to recognise the emptiness of our patriotism and the abnormity of our state system, and makes us hide our faces in shame. You look at me with a smile and ask: What is gained by that? No revolution is made out of shame. I reply: Shame is already revolution of a kind; shame is actually the victory of the French Revolution over the German patriotism that defeated it in 1813. Shame is a kind of anger which is turned inward. And if a whole nation really experienced a sense of shame, it would be like a lion, crouching ready to spring.”   

आइये हम मजदूरों के सामने अपनी असमर्थता को स्वीकार करें. मिलकर कहें कि हमें शर्म है-

धिक्कार है!                           धिक्कार है!                                                    धिक्कार है!