(वेर्नर बोन्फिल्ड की किताब ‘क्रिटिकल थ्योरी एंड द क्रिटिक ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनमी’ से अनूदित)

आने वाले दिनों के सन्देश

आज़ाद और बराबर के समाज को सोचने की दिक्कत का संबंध स्वयं इसके विचार से है. अमूर्त संपत्ति, प्रक्रिया में मूल्य, प्रक्रिया में पैसा और स्वयं पूँजी के पीछे भागने से अलग, और राज्य पर कब्जा, राजनीतिक शक्ति की चाह और रक्षा, आर्थिक मूल्य और मारक निपुणता से अलग, एवं सामाजिक निधि की नैसर्गिक ज़रुरत की तरह श्रम के विचार और श्रम के अर्थतंत्र की तरह अर्थतंत्र की संकल्पना से अलग यह मानव विकास के सर्वथा भिन्न अन्तस्तत्त्वों का अनुसरण करता है- यह चाहता है मानव उद्देश्यों वाला समाज, सार्वभौमिक मानव मुक्ति.

कम्युनिस्ट व्यक्तियों की संपत्ति और पूंजीवादी समाज की संपत्ति दो भिन्न यथार्थ की बातें हैं. आज़ाद और बराबर के समाज के लिए सामाजिक संपत्ति आज़ाद वक़्त है. ‘ख़ुशी के लिए’ (मार्क्स) समय, मनमाना बेकार समय (अडोर्नो) संपत्ति का कम्युनिस्ट पैमाना और रूप है.[1] साम्यवाद के लिए समय पैसा नहीं है, समानता कानून के समक्ष एक अमूर्त समानता नहीं है और श्रमिक समय की ठठरी नहीं है. प्रकृति के साथ इसका मेटाबोलिज्म/उपापचय अमूर्त संपत्ति के संचय का साधन नहीं है. इसके बदले कम्युनिस्ट व्यक्तियों के इस समाज का चरित्र व्यक्ति मानव की ज़रूरतों की समानता और मनुष्यों की संतुष्टि से बनता है. यह मनुष्यता को एक उद्देश्य मानता है, साधन नहीं. मूल्य का समय और मानव उद्देश्यों का समय दो भिन्न दुनिया की बातें हैं. मानव उद्देश्यों का समय स्वयं कम्युनिस्ट व्यक्तियों के समुदाय द्वारा मानव अस्तित्त्व के साधनों के जनवादी संगठन का समय है.[2]

मानव उद्देश्यों का समाज अब तक के सम्पूर्ण इतिहास के विरुद्ध खड़ा है. इसमें अन्तर्निहित है कि इस इतिहास की प्रगति ठिठक गयी है और अब समाज नए सिरे से बसाया जा सकता है.[3]

वर्तमान की आलोचना के बारे में

लुइ अल्थुज़र सही थे जब वह कहते थे कि आदमी (Man ) का कोई अस्तित्व नहीं है. ऐसा आदमी दरअस्ल कुछ नहीं करती और इसलिए ऐसे आदमी की तरह वह स्वयं को विकृत आर्थिक रूपों से अलग करने में असमर्थ है. अल्थुज़र से भिन्न,  आदमी हमेशा ही वस्तुकृत आदमी है और ‘यह वस्तुमत्ता ही है जो आचरण के विषयीगत/आत्मगत तरीकों को बुनती है’[4]. पूँजी की इस उलटी-पलटी दुनिया[5] में आदमी एक अन्-कल्पता (non-conceptuality) है अर्थात् सामाजिक व्यक्ति अपने ही सामाजिक उत्पादों द्वारा शासित हैं जो स्वयं को आर्थिक गुणों के अनियंत्रित आन्दोलन के रूप में प्रकट करते हैं और कर्मरत कर्ताओं के ऊपर अंधी शक्तियों के साथ हमला करते हैं. हाँ यह हमारी अपनी दुनिया है जो न केवल हमारे ऊपर कायम है बल्कि हमारे-आपके अंदर से ही कायम है. 

आर्थिक प्रकृति एक सामाजिक प्रकृति है. इसकी वास्तविकता इसके अपने सामाजिक संदर्भ में अंतर्भूत है. समाज स्वयं को आर्थिक वस्तुमत्ता के उलटे रूप में प्रकट करता है. वस्तुमत्ता ‘सारे रिश्तों, संस्थाओं और शक्तियों के लिए एक व्यापक पद है जिनमे मनुष्य कर्मरत है’.[6] इस तरह सामाजिक रिश्तों के ख़ास रूप एक ‘वस्तुगत कल्पता’ हासिल करते हैं.[7]अंतिम रूप से सामाजिक विकास को बद्ध करने वाले कुछ सामान्य आर्थिक नियमों के आविर्भाव की तरह समाज की परम्परागत परिकल्पना से अलग, राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के प्रति आलोचनात्मक होने का अर्थ है बद्ध सामाजिक सम्बन्धों के ससीम यथार्थ की तरह आर्थिक वस्तुमत्ता के सम्पूर्ण तंत्र की आत्मालोचना (क्रिटिक ऐड  होमिनेम). प्रकृति के किन्हीं कल्पित आर्थिक नियमों से वास्तविक सामाजिक सम्बन्धों की व्युत्पत्ति करने की बजाय यह वास्तविक सामाजिक सम्बन्धों से समाज के आर्थिक तंत्र को विकसित करता है. यह दृष्टि कि ‘हम प्रकृति से अलग कुछ नहीं कर सकते’ पूंजीवादी समाज को प्रकृत करती है, और इस तरह इसकी भावी प्रकृति में समायोजित हो जाती है.[8] आत्मालोचना का आलोचनात्मक उद्देश्य पहचान के वशीकरण के खिलाफ सोचना है, आर्थिक वस्तुओं को भीतर से तोड़ते हुए. इसलिए इसका आग्रह है कि आर्थिक संबंध ‘उत्पादन के वर्तमान संबंधों’ की वस्तुगत ज़रुरत को प्रकट करते हैं.[9] सामाजिक व्यक्ति अपनी ज़िन्दगी के लिए उन आर्थिक ताकतों की स्वतंत्र गति पर आश्रित होती है जिसपर उसका कोई नियंत्रण नहीं है; फिर भी यह गति आर्थिक प्रकृति का किया-धरा नहीं है. यह उसकी अपनी क्रिया है.[10]

वास्तविक सामाजिक संबंध स्वयं को वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों के आन्दोलन के उलटे रूप में प्रकट करते हैं. समाज से आदमी वही पाती है जो वह समाज को देती है. अर्थात् व्यक्ति स्वयं को आर्थिक चीज़ में वस्तुकृत करती है, इसे एक चेतना और संकल्प प्रदान करती है, और आर्थिक चीज़ व्यक्ति में ‘मूल्य के दलाल’ की तरह स्वयं को आत्मकृत करती है. श्रीमान् पूँजी और श्रीमती धरती (Monsieur le Capital and Madame la Terre) की इस उलटी दुनिया में ‘व्यक्ति कर्ता’ आर्थिक शक्तियों के महज ‘चारित्रिक नक़ाब’ हैं. वे ‘सार्वभौम की अनिवारता’ अर्थात् ‘मूल्य के नियम’ के तहत जीते हैं जिसे पूँजीवाद आदमियों के सर के ऊपर से हासिल करता है.[11] यह अतिसंवेदनशील दुनिया, जो कि वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों की दुनिया है, मानवीय सामाजिक व्यवहारों की संवेदनशील दुनिया को ‘चीजों के बीच के सम्बन्द्धों के फैन्टेस्टिक रूप’ में समाहित करती है[12]. यह ‘व्यक्तियों को अपने प्रकार्य में पतित करती है’ चाहे वे स्वयं को अपनी परित्यक्त दुनिया से ऊपर उठाने का कितना ही प्रयास क्यों न करें.[13]

स्वीकार और निषेध

सामाज का आलोचनात्मक सिद्धांत होने के नाते राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना स्वीकारात्मक विशेषता से रहित है. समाज को एक प्राकृतिक सार प्रदान करने के बदले, जिसके अनुसार आर्थिक रूपों के मूल को प्रकृति में स्थिर किया जाता है, यह ‘इस वाद को’ खारिज करता है ‘कि समाज प्राकृतिक नियमों का विषय यानी विचारधारा है’[14]. नकली हीरे की तरह यह समाज इस झूठे वायदे से चमकता रहता है कि अगर योजना सही बनाई जाय तो आर्थिक विकास की परवर्ती प्रगति अतिरिक्त मूल्य के उत्पादक संपत्तिहीनों को अपनी समाज-आर्थिक स्थितियों के निष्ठुर यथार्थ से मुक्त कर देगी. आलोचनात्मक सिद्धांत इसी शर्त पर आलोचनात्मक है कि यह इस नकलीपन का प्रतिरोध करता है, प्रगति के एक ऐसे दर्शन के अधिग्रहण से इनकार करते हुए जो पूरी तरह से वर्तमान सामाजिक संबंधों में धंसे हैं. इसलिए यह ‘चीजें जैसी हैं वैसी स्वीकार करने से’[15] इनकार करता है. समाज की इसकी संकल्पना पूरी तरह निषेधात्मक है: ‘किसी निषेध का नकार इसका विपर्यय नहीं लाता’ और अगर ऐसा विपर्यय होता है तो यही साबित होगा कि ‘निषेध पर्याप्त नकारात्मक नहीं था’. संक्षेप में, ‘नकारात्मक तभी तक नकारात्मक है जब तक यह व्यतीत नहीं है[16]’. इसलिए किसी प्रगतिशील भविष्य के विचार में इसे कोई दिलचस्पी नहीं[17]. इसके बदले इसका ‘वस्तुगत लक्ष्य संदर्भ के भीतर से ही फूट पड़ना है’.[18] ऐसा कोई सुविधाजनक बिंदु नहीं जहाँ से मानव उद्देश्यों का समाज अवतरित किया जा सकता है. इसका यथार्थ पूरी तरह नकारात्मक है अर्थात् क्रान्ति/आलोचना में जो ‘नकारात्मक’ है वह स्वयं में एकरेखीय या प्रगतिबद्ध ‘सकारात्मक समाधान’ के विचार को धारण नहीं करता.[19]

मानव उद्देश्यों का समाज पूंजीवादी सम्बन्धों का गुप्त रहस्य नहीं है. दरअस्ल इसका गुप्त रहस्य स्वत्वहरण की विधान-निर्मातृ हिंसा की ताकत है जिसने आबादी के विशाल जनसमूह को निर्वाह के साधनों से बेदखल किया, जीवन के साधनों तक प्रत्यक्ष पहुँच से अतिरिक्त मूल्य के उत्पादकों को काट दिया. विधान-निर्मातृ हिंसा आर्थिक नियति के रूप में सामने आती है, जो समान वैधानिक कर्ताओं के बीच श्रम-शक्ति की ख़रीद-फ़रोख्त को सीधे उत्पीड़न से स्वतंत्र आपसी लेन-देन की तरह संभव बनाती है. श्रम शक्ति को खरीदने और बेचने वालों के हित समान नहीं हैं. उनका सभ्य निर्वहन एक राजनीतिक विषय है. अर्थात् राज्य बुर्जुआ समाज के राजनीतिक चरित्र के सकेन्द्रण द्वारा पूँजी और श्रम के सम्बन्धों के विराजनीतिकरण का अभियुक्त है. राज्य कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है. यह सिक्कों में ढली स्वतंत्रता वाले बुर्जुआ संबंधों का राजनीतिक रूप है. इसके उद्देश्य से कोई समझौता संभव नहीं. राजनीतिक राज्य समाज के विराजनीतिकरण की प्रक्रिया है. यह स्वतंत्रता के बुर्जुआ रूप को श्रम-शक्ति के खरीददार और अतिरिक्त-मूल्य के उत्पादकों के बीच ठेका सम्बन्धों के रूप में योजित करता है जहां दोनों क़ानून और पैसे के समविषयी हैं. इस तरह मार्क्स ने ध्यान दिलाया था कि समान अधिकारों की बुर्जुआ संकल्पना असामनता के अधिकार अर्थात् निजी संपत्ति के अधिकार को प्रत्यक्ष करती है.[20] इसलिए वह कहते हैं कि वे सब जो अपनी श्रम-शक्ति बेच कर जीते हैं, ‘स्वयं को उस रूप के सीधे उलट पाते हैं जिसमें अभी तक समाज में व्यक्तियों ने स्वयं को सामूहिक अभिव्यक्ति प्रदान की है, अर्थात् राज्य;’ इसलिए स्वयं को व्यक्तियों के रूप में पाने के लिए उन्हें निश्चय ही राज्य को उखाड़ फेंकना होगा.’[21] आज़ाद और बराबर का समाज अपनी ‘”आतंरिक शक्तियों” को सामाजिक शक्तियों’ की तरह संगठित करता है और इस तरह स्वयं से सामाजिक शक्ति को ‘राजनीतिक शक्ति के रूप’ में पृथक् नहीं करता.[22]

आलोचनात्मक सिद्धांत एक ऐसे व्यवहार की मांग करता है जो बर्बरता से लड़े और जोर देकर कहता है कि नरक में सबकुछ नारकीय है. मार्क्स[23] की तरह, यह श्रम की स्वतंत्रता के लिए क्रान्ति जैसी क्रान्ति के विचार को प्रतिगामी जान कर खारिज करता है, नहीं मानता कि बुर्जुआ समाज अपने भीतर मानव मुक्ति की ज़रुरत को धारण करता है, मजदूर वर्ग के फायदे के लिए ऐतिहासिक प्रगति की सोच के ‘समझौतावादी विद्रोह’ का विरोध करता है- ऐसा विद्रोह जो दासप्रथा के खात्मे के बदले दासों के लिए नयी दलाली चाहता है. वर्ग निहायत ही निषेधात्मक संकल्पना है. वर्ग समाज की आलोचना अपना सकारात्मक समाधान अच्छी तनख्वाह और अतिरिक्त मूल्य के उत्पादकों के पूर्ण रोज़गार में नहीं पाती. इसका सकारात्मक समाधान केवल वर्गहीन समाज में है.

मजदूरों के लिए क्रान्ति की तरह क्रान्ति की सोच एक धर्म-दार्शनिक विचार को अभिव्यक्त करती है. मसलन, लुकाच के अनुसार मजदूर रैकरण को रोक सकता है क्योंकि जब तक वह इसके विरोध में सचेत विद्रोह करता रहता है, ‘उसकी मनुष्यता और उसकी आत्मा जिंसों में नहीं बदलती’.[24] इस तरह रैकरण मजदूरों की आत्मा को प्रभावित नहीं करती, मानो आत्मा इस दुनिया की नहीं बल्कि अपौरुषेय है. लुकाच क्रांतिकारी कर्ता को, जिसे वह पार्टी के रूप में पुनर्प्रस्तुत सर्वहारा कर्ता की पूर्णता कहते हैं, किसी ऐसी चीज़ से प्राप्त करते हैं जो बिलकुल अदृश्य है- परन्तु इतिहास अदृश्य नियमों के हिसाब से नहीं खुलता. आलोचनात्मक सिद्धांत सामाजिक शक्तियों की आत्मा की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति नहीं है. इसके बदले इसका निशाना खुद ये सामाजिक सम्बन्ध ही हैं जिनका ध्वंस जरूरी है. अर्थात् अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में ऐतिहासिक भौतिकवाद इतिहास की प्रगति के विरुद्ध सोचता है और इस तरह यह वास्तव में ‘इतिहास को उलटे रंदे से छीलता है’ (बेंजामिन) कुछ इस तरह कि मानव मुक्ति का निषेधात्मक विवेक ‘एक ऐसी राजनीति में न बदल जाय जिसमें से वस्तुतः इसे बाहर आना था’ (अडोर्नो). [25]

इतिहास खुलता नहीं है. यह कोई पक्ष नहीं लेता. वास्तव में ‘इतिहास कुछ नहीं करता, इसके ‘पास असीम संपत्ति नहीं है’, यह कोई “लड़ाई नहीं छेड़ता”. यह मनुष्य है, वास्तविक, जिंदा मनुष्य जो सब करता है, जो धारण करता है और लड़ता है; “इतिहास” कोई अलग शक्ति नहीं जो अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए मनुष्य को साधन की तरह उपयोग करता है; अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए मनुष्य के क्रिया-कलाप से अलग इतिहास कुछ नहीं है.[26] ये उद्देश्य धर्म-दर्शन आबद्ध, प्रकृति निबद्ध या सोद्देश्य (टेलीयोलोजिकली) सक्रिय नहीं हैं. पूँजीवाद का उद्देश्य स्वयं अपने फायदे में अमूर्त संपत्ति की मुनाफेदार जमाखोरी है. मानव उद्देश्य का कम्यून कोई अस्तित्वमान मानव उद्देश्य नहीं है. इसका यथार्थ पूरी तरह निषेधात्मक है. एक युद्ध से दूसरे युद्ध तक और श्रम के इस विभाजन से उस विभाजन तक इतिहास घटनाओं के एक रैखिक अनुक्रम की तरह दीखता है. यह प्रतीति स्वयं में यथार्थ है पर अर्थहीन. आखिर यह कहने का क्या मतलब है कि इतिहास घटनाओं का अनुक्रम है? घटनाएँ किसकी और क्या था जो इतना घटनापूर्ण था? इतिहास प्रगति की लोकोत्तर शक्ति तभी प्रतीत होती है जब कोई इससे अमूर्त करता है और घटनाओं के अनुक्रम की तरह वर्णन करता है, जिसे ‘ऐतिहासिकता’ जैसे पद नाम देते हैं. ‘ऐतिहासिकता’ में इतिहास विहीन इतिहास का विचार शामिल है.[27] कहना न होगा कि इतिहास को समझने के लिए घटनाओं के अनुक्रम की तरह इतिहास की प्रतीति को ‘तोड़ना’ जरूरी है.[28]

उत्पीड़ितों की परम्पराओं के मूल्यांकन के लिए ,खतरे की बू और मृत्यु की गंध पहचानने, संघर्ष का साहस और चतुराई की संवेदना हासिल करने, शहादत की भावना को अन्तस्थ करने, चाहे कितना ही क्षणिक हो पर एक ऐसे समय की गहनता को, जहाँ सदियों के कूड़ा-कर्कट की प्रगति लगभग ठिठक जाती है, समझने के लिए हमें इतिहास में से, स्वतंत्रता की लड़ाइयों, दास विद्रोहों, कृषक विद्रोहों, लेस एनरेजेस के संघर्षों, मजदूर वर्ग की हडतालों, दंगों, विद्रोहों और क्रांतियों में से सोचने की ज़रुरत है.[29] इतिहास कहीं नहीं ले जाता; इसका कोई टेलोस, कोई उद्देश्य, कोई लक्ष्य नहीं और यह कोई पक्ष नहीं लेता. सबसे बुरे रूप में, काली घटाओं और धूम्र-पूरित आकाश के नीचे यह विजयी प्रगति के पथ पर चला चलता है. सबसे अच्छे रूप में, इसकी प्रगति रोक दी जाएगी. यद्यपि कई बार कोशिशें हुईं पर अभी तक ऐसा इतिहास बना नहीं है. हमारे समय में इस कोशिश को साम्यवाद कहा जाता है- निषेध की ऐसी कोशिश जो दुनिया को ‘सदियों के सारे कूड़ा-कर्कट’ से छुटकारा दिलाना चाहती है. मार्क्स के लिए उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष अंतिम उत्पीड़ित वर्ग का संघर्ष है, बार-बार फिर से. उत्पीड़ित वर्ग उत्पीड़न की प्रगति के लिए नहीं लड़ता- यह तो दरअस्ल इतिहास के ‘अधिपतियों’ का काम है.[30] सर्वहारा हमारे समय के उत्पीड़ित वर्ग का नाम है. मार्क्स कहते हैं कि यह अंतिम वर्ग है. हो सकता है कि यह अंतिम वर्ग न हो पर तब इतिहास की निरंतरता को तोड़ना संभव नहीं.[31] कहने का मतलब यह है कि वास्तव में उत्पादन के अस्तित्वमान सामाजिक संबंधों से परे कोई गुप्त यथार्थ नहीं है. ‘पूर्ण मिथ्या है’.[32] पूरे को जाना होगा.

ना  कहने की दिक्कत के बारे में

केवल एक रैकृत चेतना ही घोषित कर सकती है कि उसके पास न केवल पूंजीवादी संकट के निदान के लिए पर्याप्त ज्ञान, राजनीतिक क्षमता और तकनीकी महारथ हासिल है बल्कि यह सब ‘मजदूरों के लिए’ है.[33] यथार्थ का इनका अभिग्रहण पूरी तरह अमूर्त है और क्या करना है, इसके ज्ञान का दावा आधारहीन. पूँजीवाद वेदनामय दशाएं पैदा करता है, निंदा की इस अनथक चेष्टा का यह व्यावहारिक सिद्धांत है. वेदनामय दशाएं (Mißstände) और वेदनामय स्थितियाँ (Zustände) एकसमान नहीं हैं. अतिरिक्त मूल्य का विस्थापित उत्पादक पूँजीवाद की स्थिति है. इससे अलग वेदनामय दशाएँ पूरी तरह परिहार्य समाज-आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन करती हैं चाहे वह संयोग का परिणाम हो या सरकार के नकारेपन या कठिन वर्ग-राजनीति का. इस तरह गरीबों और असहायों के हित में पूंजीवादी आर्थिकी को नियमित करने योग्य भद्र राजनीतिक हस्तक्षेपों के द्वारा इन्हें संशोधित किया जा सकता है. यह आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि नज़रों से ओझल हो जाती है कि पूंजीवादी संपत्ति का रूप अनिवार्यतः अतिरिक्त मूल्य के बेदखल उत्पादकों के वर्ग पर कायम है और बदले में ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य के माध्यम से मजदूरों की दशाओं से पार पाया जा सकता है. और तब कहा जाता है कि एक अर्थव्यवस्था की नियत गति का भद्र सरकारी हस्तक्षेपों द्वारा भलाई के लिए समाधान और रूपांतरण किया जा सकता है, जहाँ ‘मनुष्यों की ज़रूरतें, मनुष्यों की संतुष्टि, कभी भी हाशिये के तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं रही’. यह सोच ‘अधिकाँश में विचारधारा से ज्यादा कुछ नहीं’ है.[34] सारतः वास्तविक दारिद्र्य के खिलाफ इसका विरोध, जो कि व्यक्तियों के एक पूरे वर्ग के जीवन को अभिशप्त करता है, वास्तव में पार्टी-पॉलिटिक्स की दुश्मनी है; चीजें जैसी हैं वैसी मानने से यह नकार को ‘’टिकट चिंतन’ में बदल देती है.[35] टिकट चिंतन ‘एकायामी’ है. यह दुनिया की पीड़ा महसूस करता है और सत्ता प्राप्ति के दावे के साथ मुक्ति के साधन की तरह अपना राजनीतिक प्रोग्राम प्रस्तुत करता है. टिकट चिंतन ‘भ्रान्ति/मिथ्यात्व’ की उद्घोषणा करता है.[36] दारिद्र्य के परे यह एक ऐसी दुनिया का वादा करता है जहाँ ‘भग्नावशेषों का ढेर’ ‘आसमान जितना ऊँचा होता जा रहा’ है.[37] टिकट चिंतन जिसकी निंदा करता है उसी पर आश्रित है. यह धार्मिक रोष और सत्ता पर निगाह के साथ इन वेदनामय दशाओं और अपनी भूलों की निंदा करता है. यह वेदनामय दुनिया को बाहर से, जहाँ यह है वहां से, तिरस्कृत करता है और ज्यादा से ज्यादा यह करता है कि पूँजीवाद के विरुद्ध विरोध को अपने लिए राजनीतिक विज्ञापन में बदल देता है. और सबसे बुरे हालात में, बढ़ते बहरेपन के साथ, पहचाने जा चुके पापियों के खिलाफ नैतिक जेहाद छेड़ कर अपना पक्ष मजबूत करता है.

बेंजामिन के इतिहास की थीसिस कहती है कि गरीब और असहाय की मुक्ति तब तक नहीं है जब तक वे स्वयं अपने प्रयास, साहस और चतुराई द्वारा स्वयं को मुक्त नहीं करते. इस बात की पहेली को हर्बर्ट मार्क्यूस सबसे बेहतर रूप में सामने रखते हैं. वह कहते हैं कि दासों ‘को अपनी मुक्ति के लिए आज़ाद होना होगा ताकि वे आज़ाद होने के योग्य हों’.[38] मार्क्यूस की बात सटीक है: पूँजीवाद की प्रगति का आपातकालीन ब्रेक खींचने और नए तरीके से समाज को बसाने के लिए एक अ-पूंजीवादी अस्मिता की ज़रुरत है, और इसकी संकल्पना की दिक्कत बहुत मामूली है: ऐसी अस्मिता वर्तमान जो कि पूंजीवादी वर्तमान है, उसमें शामिल नहीं है. मानव निर्वाह और सामाजिक पुनुरुत्पादन के पूंजीवाद संगठित तरीकों को ‘ना’ कहने का वास्तव में क्या मतलब है? पूँजीवाद को ‘ना’ कहना आसान है. लेकिन यह ‘ना’ क्या है इसे बताना कठिन है. ‘ना’ उस समाज से बाहर नहीं बल्कि उसी समाज के अन्दर सक्रिय है जिसका यह विरोध करता है. और जैसा कि मार्क्स वर्ग-संघर्ष को इतिहास का मोटर कहते हैं, ‘ना’ निषेधात्मक दुनिया को आगे खींचता है. यह इसकी क्रियाशील शक्ति है. इसी तरह ‘ना’ क्या है इसे बताने का अर्थ है कि उसमे शामिल ‘ना’ सकारात्मक हो जाता है किसी चीज़ के स्वीकारात्मक हाँ में, जिसकी कोई मान्य अंतर्वस्तु नहीं, सिवाय उस समाज के जिसका वह विरोध करता है. ‘ना’ अपने ही त्याज्य सामाजिक संदर्भ के अंतर्भूत है. इसकी कोई स्वतंत्र वास्तविकता नहीं और न ही इसकी कोई सोद्देश्य/टेलीयोलोजिकल दिशा है. अस्तित्वमान सामाजिक संबंधों के परे कोई यथार्थ नहीं.

निषेध के यथार्थवाद के बारे में

इस तरह मानव उद्देश्यों के समाज के लिए संघर्ष की एक यथार्थवादी संकल्पना की आवश्यकता है. मानव मुक्ति की प्रयोगशाला के रूप में वर्ग-संघर्ष को फिर से खोज निकालना होगा. यह संघर्ष किसी अमूर्त विचार का अनुसरण नहीं करता. यह ‘कठोर और भौतिक चीजों’ को पाने का संघर्ष है ‘जिनके बिना परिष्कृत और आध्यात्मिक वस्तुओं का कोई अस्तित्व संभव नहीं’.[39] तब फिर किस लिए मजदूर वर्ग ‘अपने में/ इन-इटसेल्फ’ संघर्षरत है? ‘अपने में’ मजदूर वर्ग बेहतर पगार और स्थितियों के लिए लड़ता है और मजदूरी की सीमा और स्थितियों की रक्षा करता है. यह पूँजी की ‘अतिरिक्त श्रम की नरभक्षी भूख’ और बेगार श्रम काल के अतिरिक्त अणुओं के लिए विनाशकारी विजय के खिलाफ और इस तरह स्वयं को समय की ठठरी मात्र बना दिए जाने के खिलाफ लड़ता है. एक ऐसे जीवन के विरुद्ध जो महज श्रम-काल की बुनावट है और इस तरह मनुष्य जीवन को महज आर्थिक संसाधन तक सीमित किये जाने के विरुद्ध संघर्ष करता है. यह आदर, शिक्षा और मानव विशिष्टता की मान्यता के लिए लड़ता है. और सबसे बढ़कर यह भोजन, वस्त्र, आवास, उष्णता, प्रेम, मित्रता, ज्ञान, ख़ुशी के लिए समय और सम्मान के लिए लड़ता है. ‘अपने में’ वर्ग की तरह इसका संघर्ष वस्तुतः ‘अपने लिए/ फॉर-इटसेल्फ’ संघर्ष है: जीवन, मानवीय विशिष्टता, जीवन-काल और सबसे बढ़कर आधारभूत मानव ज़रूरतों के लिए. यह सबकुछ वह उन स्थितियों में करता है जिसमें इसके द्वारा उत्पादित भौतिक निधियों की बढ़ोत्तरी अपने पूंजीवादी रूपों की सीमा से परे ठेलती हैं. प्रत्येक ट्रिकल-डाउन प्रभाव जो पूंजीवादी संचय पैदा करता है संपत्ति के पूंजीवादी संचय में एक अपूर्व और सतत ट्रिकल अप को प्रत्याशित करता है. और तब समाज ‘ अपने को वापस बर्बरता की क्षणिक दशा में पड़ा पाता है; ऐसा प्रतीत होता है मानो अकाल, एक विश्वव्यापी युद्ध, ने निर्वाह के सारे साधनों की आपूर्ति भंग कर दी है’.[40]

प्रतीयमान आत्म-गतिशील आर्थिक शक्तियों के मानवीकरण की तरह सामाजिक व्यक्तियों का अस्तित्व सामाजिक चेतना को आर्थिक चेतना तक सीमित किया जाना अपरिहार्य नहीं मानता. यह अर्थशास्त्र की संकल्पना को अनुभूत संकल्पना और आर्थिक चेतना को अनुभूत चेतना मानता है. आर्थिक चेतना एक पीड़ित चेतना है. यह निर्वाह के साधनों तक पहुँच की लड़ाइयों की नाखुश चेतना है. यही लड़ाइयाँ उत्पीड़ित वर्ग को ऐतिहासिक ज्ञान का धारक बनाती हैं. वर्ग संघर्ष ‘अतीत के साथ एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करता है’.[41] चाहे यह अनुभव ‘दबाने के बदलते रूपों में ठोस को प्रतिरोध से दमन में बदलता है’ या चाहे ठोस को दमन के रूपों में बदलता है, यह मसला अनुभूत इतिहास का है. ‘उतने ही स्वतंत्र संकल्प हैं जितने स्वतंत्र होने के संकल्प वाले आदमी हैं’.[42]

मानव उद्देश्यों वाला समाज केवल निषेध में ही परिभाषित हो सकता है. एक निषेधात्मक दुनिया के विरुद्ध संघर्ष में कुछ भी निश्चित नहीं सिवाय कंगाली के. पर अनिश्चितता भी एक अनुभूत संकल्पना है. ऐतिहासिक रूप से इसने काउंसिल, कम्यून, राते, सोवियत, जनसभाओं, मुक्त इलाकों और अब चौराहों में रूप धारण किया है- बार्सिलोना और मेड्रिड से इस्ताम्बुल तक, ट्युनिस से काहिरा तक, एथेंस से रिओ तक, ब्युनस आयर्स से न्यूयार्क और बीजिंग और…तक सड़कों का यह जनवाद, विपरीत दिखने के बावजूद कोई भी गतिरोध प्रकट नहीं करता. यह आज़ाद और बराबर के समाज की प्रयोगशाला है- इसका प्रमाण इसकी अपनी अनिश्चितता है.[43]                  


[1] Karl Marx, Theories of Surplus Value, vol. 3 (London 1972), p. 252. Theodor Adorno, Gesellschaftstheorie und Kulturkritik (Frankfurt 1975), p. 43. ‘बेहोशी हमारे होश का पैमाना हो जाए’ (शमशेर बहादुर सिंह)

[2] On communism as the society of communist individuals, see Herbert Marcuse, Soviet Marxism (London 1958), p. 127

[3] This insight is core to Walter Benjamin’s ‘Theses on the Philosophy of History’, in Illuminations (London 1999). The understanding of communism as the ‘end of the muck of ages’ that ‘founds society anew’ is Marx’s – Karl Marx and Friederich Engels, The German Ideology, Collected Works, vol. 5 (London 1976), p. 53

[4] Theodor Adorno, ‘Einleitung zum Vortrag “Gesellschaft”’, Soziologische Schriften I, in Gesammelte Schriften, vol. 8 (Frankfurt 1997), p. 570

[5] मार्क्स के शब्दों में जिंसों के ‘topsy-turvy world’ में.

[6] Theodor Adorno, ‘Soziologie und empirische Forschung’, in Theodor Adorno, Hans Albert, Ralf Darendorf, Jürgen Habermas, Harald Pilot and Karl Popper, Der Positivismusstreit in der deutschen Soziologie (Munich 1993), p. 84.

[7] Theodor Adorno, ‘Drei Studien zu Hegel’, in Gesammelte Schriften, vol. 5 (Frankfurt 1971), p. 209

[8] David Harvey, ‘History versus Theory: A Commentary of Marx’s Method in Capital’, Historical Materialism, vol. 20, no. 2 (2012), p. 13.

[9] Theodor Adorno, Negative Dialectics (London 1990), p. 354; translation amende

[10] On ‘cracking’ and ‘doing’, see John Holloway, Change the World without Taking Power (London 2002) and Crack Capitalism (London 2010).

[11] Theodor Adorno, Negative Dialectics, pp. 311, 305, 311, 199.

[12] Marx, Capital, vol. I (London 1990), p. 165.

[13] Adorno, Negative Dialectics, 311. This part draws on Marx, Capital, vol. I, p. 92

[14] Adorno, Negative Dialectics, p. 355

[15] Adorno, Negative Dialectics, p. xix

[16] Adorno, Negative Dialectics, pp. 159–60

[17] See Benjamin, ‘Theses’, and Theodor Adorno, Lectures on History and Freedom (Cambridge 2008a) and Theodor Adorno, ‘Fortschritt’, in Stichworte. Kritische Modelle 2 (Frankfurt 1969), for a critique of the philosophy of progress. Progress has already been made: from one set of rulers to another (Benjamin). Adorno agrees and disagrees with Benjamin’s notion of history as a universal history of the victors. For Adorno, history appears as such a universal history by hindsight only. It feeds on the circumstance that the many attempts to crack its continuum have failed, and what failed vanished from the record only to appear in the form of a triumphal succession of one set of rulers to the next. For history to be made, its progress has to be stopped.

[18] Adorno, Lectures on History, p. 407.

[19] I owe this point to Richard Gunn.

[20] On this, see Karl Marx, ‘Critique of the Gotha Programme’, in Marx Engels Selected Works, vol. 3 (Moscow 1970).

[21] Marx and Engels, German Ideology, p. 80. For an insightful account of Marx’s conception of the directly social democracy of the communist individuals as the antithesis to the state-form of bourgeois society, see Miguel Abensour, Democracy Against the State (London 2011).

[22] Karl Marx, ‘On the Jewish Question’, Collected Works, vol. 3 (London 1975), p. 168.

[23] Marx, Critique of the Gotha Programme. According to Benjamin, ‘Theses’, p. 250, Marx attacked the Gotha Programme of German Social Democracy because he was ‘smelling a rat’.

[24] Georg Lukács, History and Class Consciousness (London 1971), p. 172.

[25] Benjamin, ‘Theses’, p. 248; Adorno, Negative Dialectics, p. 143.

[26] Karl Marx, The Holy Family, in Marx Engels Collected Works, vol. 4, p. 93.

[27] In Benjamin’s (‘Theses’, p. 254) judgement, the transformation of history into a science without history characterizes the ‘bordello of historicity’.

[28] I use this phrase in reference to Holloway, Crack Capitalism.

[29] The notion of thinking out of history rather than about history, derives from Adorno’s negative dialectics which argues that for thought to comprehend society it needs to think out of society. For him, thinking about society, or about history, amounts to an argument based on hypothetical judgements that treat society as an ‘as if’, leading to dogmatic claims about its natural character.

[30] On this, see Theodor Adorno and Max Horkheimer, Dialectic of Enlightenment (London 1979).

[31] On this, see Werner Bonefeld, ‘Critical Theory, History, and the Question of Revolution’, in ed. Shannon Briscant, Communism in the 21st Century, vol. 3 (Oxford 2014); ‘Notes on Fetishism, History and Uncertainty: Beyond the Critique of Austerity’, forthcoming Isegoria. Revista de Filosofia Moral y Politica, no. 50 (2014).

[32] Theodor Adorno, Minima Moralia (London 1974), p. 50.

[33] Adorno, Lectures on History, p. 25

[34] Adorno, History and Freedom, p. 51

[35] See Adorno and Horkheimer, Dialectic and Theodor Adorno, Ästhetische Theorie (Frankfurt 1970), p. 377

[36] Adorno, Lectures on History, p. 28

[37] Benjamin, ‘Theses’, p. 249

[38] Herbert Marcuse, Der eindimensionale Mensch (Darmstadt 1967), p. 61. See also Werner Bonefeld, ‘State, Revolution and Self-determination’, in ed. Werner Bonefeld and Sergio Tischler, What is to be Done? (Ashgate 2002), p. 133.

[39] Benjamin, ‘Theses’, p. 246

[40] Karl Marx and Friederich Engels, The Communist Manifesto (London 1997), p. 18

[41] Benjamin, ‘Theses’, p. 254

[42] Adorno, Lectures on History, p. 265

[43] On this see Katarina Nasioka, ‘Communities in Crisis’, Massimo de Angelis, ‘Social Revolution and the Commons’ and Massimiliano Tomba, ‘Clash of Temporalities’, all forthcoming in South Atlantic Quarterly, vol. 113, no. 2 (2014).