वेर्नर बोन्फेल्ड के अंग्रेजी लेख से अनूदित (Final Version forthcoming in Antonio Oliva, Ivan Novara and Angel Oliva (eds.) Marx and Contemporary Critical Theory, Palgrave, sometime 2020. https://www.researchgate.net/publication/334132183_On_Capital_as_Real_Abstraction)

वास्तविक अमूर्तन का परिचय

राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्स की आलोचना यह पहचानती है कि पूंजीवादी समाज में आदमी स्वयं अपनी सामाजिक दुनिया की कर्ता नहीं है. इसके बदले वह वस्तुतः उद्घाटित होती आर्थिक शक्तियों का मानवीकरण है जो स्वयं को कर्मरत व्यक्तियों के ऊपर अपने ही आतंरिक नियमों और अपनी ही संकल्पशक्ति के साथ आरोपित करती है. उनकी गति जीवन के साधनों के मालिकों को सम्पन्न करती है और संकटग्रस्त है, जो अक्सर ही सामाजिक संपदा के प्रत्यक्ष उत्पादकों के लिए भयानक तबाही लाती है. भव्य सामाजिक धन-संपदा के संचयन के बीच और बेहतर सुविधाओं के लिए लड़ी गयी लम्बी लड़ाइयों के बाद भी अचानक, पलक झपकते ही और बिना किसी चेतावनी के ये आर्थिक शक्तियां उन्हें उनके निर्वाह के साधनों से काटने लगती हैं और फिर समाज ‘अपने आप को अचानक क्षणिक बर्बरता की स्थिति में पड़ा पाता है; ऐसा लगता है मानो अकाल ने, तबाही के एक विश्वयापी युद्ध ने निर्वाह के तमाम साधनों की आपूर्ति भंग कर दी है’ (मार्क्स और एंगेल्स १९९७:१८).

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से जुड़ी परम्परागत मार्क्सवादी व्याख्या से अलग विकास के आर्थिक नियम किसी अमूर्त ढंग से समझे गए पार-ऐतिहासिक आर्थिक प्रकृति के नियम नहीं हैं जो इतिहास के माध्यम से उद्घाटित होते हैं और मूर्त सामाजिक सम्बन्धों की इतिहास विशिष्ट रीतियों में स्वयं को प्रकट करते हैं. इस दृष्टि से अलग यह शर्त कि आदमी को खाना ही पड़ता है और इसलिए प्रकृति से विनिमय करना ही होता है, पूँजीवाद की व्याख्या नहीं करती और न ही पूँजीवाद इससे प्रसूत है. आदमी अमूर्त में नहीं खाती. आलोचनात्मक तरीके से देखने पर ऐतिहासिक भौतिकवाद उस पूंजीवादी समाज की आलोचना है जिसे आँख मूँद कर प्राकृतिक मान लिया जाता है . दूसरे शब्दों में, विकास के आर्थिक नियम पूरी तरह उत्पादन के सामाजिक सम्बन्धों द्वारा बद्ध हैं. आर्थिक वस्तुओं के आपसी सम्बन्धों की तरह समाज की प्रतीति में जो प्रकट होता है वह कोई अमूर्त कल्पित प्रकृति नहीं है. बल्कि आर्थिक वस्तुमत्ता की तरह समाज में जो प्रकट होता है वह अपने सामाजिक सम्बन्धों में मनुष्य हैं. अर्थात् विकास के तथाकथित आर्थिक नियम एक निश्चित रूप वाले सामाजिक सम्बन्धों की सामाजिक प्रकृति को अभिव्यक्त करते हैं.[1] इस तरह ‘पूँजी’ का प्रश्न आर्थिक वस्तुओं के बीच सम्बन्धों की तरह अभिव्यक्त लोगों के बीच के सामाजिक सम्बन्धों अर्थात् वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों का प्रश्न बन जाता है.

पूँजीवाद में आदमी आर्थिक अमूर्तनों द्वारा शासित होती है जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है. आर्थिक प्रवर्ग नैसर्गिक ज़रुरत लगने वाले वास्तविक अमूर्तनों द्वारा सामाजिक अनिवार्यता की तरह प्रस्तुत होते हैं. उनकी नैसर्गिक शक्ति प्रकृति के साथ पूंजीवाद संगठित उपापचय/मेटाबोलिज्म की अंतर्निहित ज़रुरत को बनाती है. ‘महान’ अर्थशास्त्रियों की मार्क्स की आलोचना का सम्बन्ध इस सीधी सी बात से है कि वे आर्थिक पदार्थ को समाज से अलग करते हैं और इस प्रकार पूंजीवादी सामाजिक सम्बन्धों की सामाजिक प्रकृति को प्रकृति के प्रत्याशित नियमों में रूपांतरित करते हैं. अर्थशास्त्र समझ में नहीं आ सकने वाले आर्थिक पदार्थ का विज्ञान है.[2]

वास्तविक अमूर्तन पद आदमी की गायब होती प्रतीति को चलते-फिरते भूतों जैसे आर्थिक प्रवर्गों का देहधारी बनाता है.[3] साहित्य में वास्तविक अमूर्तनों के ‘गुणों’ को कभी ‘मूल्य अमूर्तन’, ‘माल अमूर्तन’, ‘विनिमय अमूर्तन’ तो कभी आर्थिक अमूर्तन कह कर भी निरुपित किया गया है. मार्क्स कहते हैं कि ‘व्यक्ति अब अमूर्तनों द्वारा शाषित होते हैं’ (मार्क्स १९७३: १६४). वह मूर्त श्रम से वास्तविक अमूर्तन की तरह मूल्य के संदर्भ में भी ‘एक्चुअल अमूर्तन’ की बात करते हैं जिसे वह ‘अमूर्त श्रम’ कहते हैं, जो आवश्यक सामाजिक श्रम का एक कालबद्ध प्रवर्ग है.[4] राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में वास्तविक अमूर्तन पद का समकालीन इस्तेमाल सॉन-रेथल (१९७१) का दायी है. उनके हिसाब से यह माल के उपयोग-मूल्य, उसके भौतिक गुण से अमूर्तन है. यह माल को शुद्धतः मात्रात्मक बनाता है. उनके अनुसार वास्तविक अमूर्तन स्वयं को विनिमय में क्रियान्वित करता है. इस तरह प्रवर्ग ‘वास्तविक अमूर्तन’ का संबंध सामाजिक श्रम के निजी अभिग्रहण की मूल्य-वैधता से है. मूल्य-वैधता विनिमय में कायम होती है. यह पैसे के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करती है, पैसे की ख़ास मात्रा में स्वयं को अभिव्यक्त करती है, और माल के मूर्त चरित्र से अमूर्तन में मूल्य-वैधता कायम करती है. सौ पौंड इसका और सौ पौंड उसका बराबर है. अर्थात् पूँजीवाद में धन-संपदा जो कि मूल्यवर्धित मूल्य है, स्वयं को उपयोगिता के अणु मात्र से रहित प्रस्तुत करती है. अर्थात् ‘समान मूल्य की वस्तुओं में कोई भेद या अंतर नहीं है. सौ पौंड का शीशा या लोहा उतना ही मूल्यवान है जितना सौ पौंड का चांदी या सोना.’ एक ‘किसी भी दूसरे के बराबर’ है (मार्क्स १९९०: १२७-८,१२९). इसलिए समतुल्य विनिमय की क्रिया ‘का अर्थ है कि विनिमय किये जाने वाले उत्पाद का उनके समतुल्य में, एक अमूर्त चीज़ में सीमित हो जाना है, लेकिन किसी भौतिक चीज़ में नहीं जैसा कि परम्परागत बहसें मानती हैं’ (अडोर्नो १९७६:८०) . मूल्य समतुल्यता का आधार ‘मालों की ज्यामितिक, दैहिक, रासायनिक या अन्य नैसर्गिक गुणों में नहीं’ पाया जा सकता है. ‘ये गुण वहीं तक सामने आते हैं जहाँ तक ये मालों को उपयोगी बनाते हैं, अर्थात् उन्हें उपयोग मूल्यों में बदल देते हैं’ (मार्क्स १९९०:१३९). मार्क्स के अनुसार मूल्य अमूर्त श्रम का उत्पाद है- श्रम जो अमूर्त है. इसलिए मूल्य समतुल्यता किसी अदृश्य चीज़ को अभिव्यक्त करती है और जिसका चरित्र न तो इल्हामी है और न ही नैसर्गिक. वह अदृश्य चीज़ ‘ स्वयं यथार्थ (Sache) में आंदोलित है’ (अडोर्नो १९७६:८०) और स्वयं को प्रस्तुत करती है, चाहे क्षणिक ही सही, पैसा रूप में, जिसमे किसी माल का विनिमय मूल्य पैसों की निश्चित मात्रा की तरह प्रकट होता है. वास्तविक अमूर्तन पैसे में शिलीभूत होता है और यह पैसा ही है जिसके माध्यम से पूंजीवादी सामाजिक पुनरुत्पादन के सामाजिक बंधन कायम होते हैं. माल जिनको पैसे से बदला नहीं जा सकता बेकार हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके मूर्त गुण हैं और वे विशिष्ट मानव ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं. मतलब सिर्फ मूल्य से है जो स्वयं को पैसे के रूप में अभिव्यक्त करता है, जहाँ पैसा हमेशा ही और पैसा होता है. इसी शर्त पर उत्पादन में लगा श्रम मूल्य उत्पादक श्रम की तरह वैध है कि यह विनिमय में अपनी मूल्य-वैधता हासिल करता है, जिसमे माल की एक मूर्त उपयोगिता पैसे में अभिव्यक्त एक शुद्ध मात्रा में सीमित की जाती है.[5]  

सॉन-रेथल के ‘वास्तविक अमूर्तन’ की खोज-बीन ज़्यादातर आलोचनात्मक समाज सिद्धांत के रूप में राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के अडोर्नो प्रेरित प्रयासों तक सीमित रही है. कहना न होगा कि अडोर्नो का निषेधपरक द्वंद्ववाद वास्तविक अमूर्तन की तरह समाज की दूरगामी आलोचना है (बोन्फेल्ड २०१६ a). अडोर्नो के बाद, न्यू रीडिंग ऑफ़ मार्क्स ने ‘वास्तविक अमूर्तन’ की व्याख्या मूल्य रूप के द्वंद्व (बैख़ॉउस १९९७), विनिमय वैधता (रिषेल्ट २००५), और ‘रूप-जननिक व्याख्याओं’ की तरह आलोचना की संकल्पनाओं (रिषेल्ट १९९५; २००१ ; बैख़ॉउस १९९२) के संदर्भ में की है, जिनका उद्देश्य वस्तुओं जैसे सामाजिक सम्बन्धों को निश्चित सामाजिक सम्बन्धों के व्युतक्रमित/उलटे रूपों की तरह उघारना है. चलते-फिरते भूतों जैसे आर्थिक प्रवर्ग, जिन्हें मार्क्स ‘प्रक्रिया में मूल्य, प्रक्रिया में पैसा और स्वयं पूँजी’ (मार्क्स १९९०: २५६) कहते हैं, वास्तविक अमूर्तन की सामाजिक क्रिया के प्रवर्ग हैं (देखें आर्थर २००४; बैख़ॉउस २००५; रिषेल्ट २००७). सॉन-रेथल (१९७८: १३) के अनुसार रूप-जननिक व्याख्या वास्तविक आर्थिक अमूर्तन के सामाजिक उद्गम, या अनुवांशिकी का अनुस्मरण है.[6] राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के रूप में निषेधपरक द्वंद्व उस आचरण का द्वंद्व है, जिसमें निश्चित सामाजिक सम्बन्ध अपनी ही सामाजिक दुनिया में गायब हो जाते हैं केवल फिर से प्रकट होने के लिए, मसलन दाम प्रतियोग्य सम्बन्धों की तरह. ‘विनिमय सिद्धांत और ठंढापन’ (अडोर्नो २००३: ३५) एक हैं और समान प्रपंच हैं वास्तविक अमूर्तन के. वास्तविक अमूर्तन (मूल्य-)वस्तु जैसा समाज है (लोत्ज़ २०१४: ११४).

वास्तविक अमूर्तन और वस्तुगत भ्रम: सामाजिक रूप के बारे में

पूंजीवादी समाज का प्राकृतिक या नैसर्गिक चरित्र एक वास्तविकता और एक आवश्यक भ्रम दोनों है. भ्रम का मतलब है कि इस समाज के अन्दर आर्थिक नियम स्वयं को प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसा प्रस्तुत करते हैं जो मानो अपनी स्वतंत्र तर्कणा और संकल्प शक्ति से समाज का शासन करती हैं. परम्परागत समाज सिद्धांत (आर्थिक) वस्तुओं द्वारा शासन को सिस्टम लॉजिक की तरह सोचता है.[7] इसलिए इनके हिसाब से उत्पादन के सामाजिक सम्बन्धों का निश्चित चरित्र स्वयं को सक्रिय कर्ताओं के पीठ पीछे स्थापित करता है और वे सब व्यवस्था(गत मांग) से सामंजस्य के लिए बाध्य हैं.[8] उनका स्वतंत्र दावा चाहे कितना भी वास्तविक क्यों न हो, वह एक भ्रम है क्योंकि इसकी वैधता सामाजिक पुनरुत्पादन की एक निश्चित रीति से पैदा होती है. अर्थात्, आदमी ‘अपने ही हाथों के उत्पाद से शासित होता’ है (मार्क्स १९९०: ७७२) और यह उसका अपना ही सामाजिक उत्पाद है जो एक मौलिक प्राकृतिक प्रक्रिया की शक्ति के साथ काम करता है. दरअस्ल पूंजीवादी सामाजिक सम्बन्ध वस्तुओं के बीच सम्बन्धों का रूप अख्तियार करते हैं और इस तरह आदमी अपनी ही सामाजिक दुनिया में गायब हो जाती है, केवल दाम की एक पर्ची के साथ फिर से हाज़िर होने के लिए. मूल्यवर्धन, अतिरिक्त मूल्य की तरह मूल्य और अधिक पैसा की तरह पैसा के स्वचारी कर्ता के रूप में समाज की प्रतीति में क्या प्रकट होता है? जो प्रकट होता है वह कोई आर्थिक प्रकृति नहीं है. बल्कि यह आदमी है जो सिक्कों की गति से शासित, सामाजिक नियंत्रण से परे आर्थिक दुनिया के मानवीकरण की तरह अपने सामाजिक सम्बन्धों में प्रकट होती है. राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्स की आलोचना चकाचौंध करने वाले आर्थिक रूपों के मायापाश के विरुद्ध सोचती है. यह प्राकृतिक शक्तियों जैसी उनकी नियतिबद्ध प्रतीति को छिन्न-भिन्न करने के लिए उनके रहस्यों के पीछे जाना चाहती है. इसलिए उनकी आलोचना आर्थिक वस्तुओं के बारे में नहीं सोचती. बल्कि यह उनकी सामाजिक नींव को उघारने के लिए उनके भीतर से सोचती है.

मार्क्स की पूँजी अर्थशास्त्र की किताब नहीं है. अर्थशास्त्र ‘मौन आर्थिक विवशता’ वाली उलटी दुनिया का, आर्थिक बाध्यता से बंधे समाज का फ़ॉर्मूला है. ऐसी परिस्थिति जहाँ प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक शक्तियों की ‘विवशता के मातहत’ प्रतिक्रिया करता है, उन शक्तियों के उद्गम का और व्यक्तियों को ‘महज चारित्रिक नकाब में, संभवतः एक अलग आर्थिक तंत्र के दलाल में’ (अडोर्नो १९९०:३११) बदलने के उनके तरीके का प्रश्न सामने रखती है. यह भंगिमा राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में आलोचना के अर्थ पर सवाल खड़े करती है. क्या आलोचित होता है? मार्क्स अपने काम को ‘आर्थिक प्रवर्गों के समूचे तंत्र की आलोचना’ (मार्क्स १९७६: २५४) के रूप में देखते थे.[9] किसी अमूर्त कल्पित श्रम की भौतिकता के आधारबिन्दु और उससे जुड़ी बहसों कि किस तरह इसे इस या उस सामाजिक हित में नियमित किया जा सकता है, की बनिस्पत वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों के रूप में समाज को उसकी अपनी संकल्पता के भीतर से ही समझा जा सकता है: ‘ वास्तव में विश्लेषण के सहारे धर्म के धुंधले सृजनों का लौकिक सार खोजना कहीं आसान है बनिस्पत कि इसके ठीक उल्टा करने के, अर्थात् वास्तविक जीवन के प्रदत्त सम्बन्धों से उन रूपों को विकसित करने के जिनमें वे महिमामंडित हुए हैं. केवल बाद वाली पद्धति ही भौतिकवादी और इसलिए वैज्ञानिक है. प्राकृतिक विज्ञान के अमूर्त भौतिकवाद, वह भौतिकवाद जो ऐतिहासिक प्रक्रिया को बाहर रखता है, की कमजोरी तत्काल प्रत्यक्ष हो जाती है जब इनके प्रवक्ता अपनी विशेषज्ञता की सीमाओं से बाहर जाकर अमूर्त और विचारधारात्मक संकल्पनाओं को अभिव्यक्त करने लगते हैं’ (मार्क्स १९९०: ४९४, fn ४).[10] राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के लिए ‘प्रत्येक उत्पाद का सामाजिक चित्रलिपि’ में रूपांतरण वास्तविक सामाजिक सम्बन्धों के भीतर से व्याख्या चाहती है. मार्क्स कहते हैं कि हमें ज़रुरत ‘आदमियों के अपने सामाजिक उत्पाद के रहस्य के पीछे जाने की है: क्योंकि मूल्य होने के नाते उपयोग की वस्तुओं का चरित्र भी आदमियों का वैसा ही सामाजिक उत्पाद है जैसे उनकी भाषा’. इस तरह मालों की जड़पूजा ‘उनको उत्पादित करने वाले श्रम के ख़ास सामाजिक चरित्र से पैदा होती हैं’ (१६७,१६५), न कि श्रम की किसी पूर्वकल्पित भौतिकता से.[11] इस तरह राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना का उद्देश्य अपनी कुंठित प्रतीति में जीवन के वास्तविक सम्बन्धों को वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों की तरह स्थापित  करना है. आर्थिक प्रवर्गों की आलोचना सामाजिक आलोचना है. यह पूंजीवादी सामाजिक सम्बन्धों को वस्तुगत भ्रम के एक ऐसे तंत्र की तरह आलोचित करती है जो प्राकृतिक शक्ति की तरह स्वयं को वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों के रूप में कायम करती है. राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना कोई वैकल्पिक अर्थ विज्ञान नहीं है. वास्तव में यह मानव पुनरुत्पादन के इतिहास विशिष्ट  सामाजिक सम्बन्धों के उलटे रूपों जैसे आर्थिक प्रवर्गों का निषेध करती है.

इस तरह मानव संवेदनशील व्यवहार आर्थिक वस्तुओं की अति-संवेदनशील दुनिया के आर्थिक रूप में उपस्थित है. केवल एक ही यथार्थ है. समाज आर्थिक वस्तु है, जो कि उलटी दुनिया है. यह मानव कर्ता को उनकी अपनी ही सामाजिक दुनिया के मानवीकरण की तरह स्वयं में समाहित करती है (देखें रिषेल्ट,२००५). सामाजिक व्यक्तियों के लिए चाहे जितनी भी बुरी हो पर वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों की वस्तुगत दुनिया सामाजिक कर्ता की अपनी बनी-बनायी दुनिया है. ऐसा लगता है मानो सामाजिक पुनरुत्पादन नियति के अधीन है, आर्थिक वस्तुमत्ता आर्थिक नियमों को ‘मनुष्य बाह्य’ शक्तियों’ की तरह और ऐसी शक्तियों की तरह अपरिहार्य बनाती है जिसपर, जैसा कि अडोर्नो (१९९०: ३२०) कहते हैं ‘ सभी मनुष्यों का जीवन टिका है…सभी की मृत्यु के गायब होते पल की ओर उन्मुख’- फिर भी, जो उनके पीठ पीछे हमला करती है, वह उनकी अपनी दुनिया है. अतः समाज के सार की तरह मनुष्य एक ऐसी दुनिया के दुराचार में दिखते हैं जो उन्हें आर्थिक अमूर्तनों के साधन मात्र में पतित करती है. जो मनुष्य के ऊपर कायम है वह उनके अन्दर से ही कायम है. संवेदनशील मानव व्यवहार स्वयं के विरुद्ध जीवित रहता है, मसलन उजरती दासप्रथा जैसी स्वतंत्रता के रूप में. पूंजीवादी धन-संपदा- अतिरिकित मूल्य जैसे मूल्य- की संकल्पना के भीतर जो है वह इसकी अपनी सामाजिक प्रकृति है. वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों के मानवीकरण के रूप में आर्थिक दलालों की कारवाइयाँ आर्थिक आवश्यकता वाली उलटी दुनिया में चेतना और संकल्प पैदा करती हैं- और वे ऐसा करते हैं ‘बिना इसे जाने ही’ (मार्क्स १९९०: १६६-६७). मार्क्स की राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना बताती है कि अबूझ आर्थिक शक्तियाँ मानव व्यवहार और इस व्यवहार की समझ में अपनी तार्किक संगति पाती हैं. इसके अनुसार आर्थिक वस्तुमत्ता के सम्बन्ध निश्चित सामाजिक सम्बन्धों वाली एक उलटी [verkehrte] और कुंठित [verru¨ckte] दुनिया की सामाजिक प्रकृति को प्रगट करते हैं. इसका मतलब यह वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों के रूप में पूंजीवादी सामाजिक सम्बन्धों का ‘एक संकल्पित व्यवहार [begriffene Praxis]’ है (स्मिट १९७४: २०७). 

मार्क्स का काम रूपों पर फोकस करता है, पहले चेतना के रूपों (अर्थात् धर्म और कानून) पर, बाद में राजनीतिक अर्थशास्त्र के रूपों पर. रिषेल्ट (२०००: १०५) की मानें तो ‘रूपों पर’ यह फोकस ‘मनुष्यों के जीवन-व्यवहार से रचित अस्तित्व, सामाजिक अस्तित्व के उलटे रूपों की आलोचना से अभिन्न है’. इसका मतलब है कि प्रत्येक सामाजिक ‘रूप’, यहाँ तक कि सबसे सरल रूप, मसलन माल , ‘पहले से ही एक उत्क्रमण है और इसी कारण लोगों के बीच के सम्बन्ध वस्तुओं के गुण की तरह प्रतीत होते हैं’ या, यह कहना ज्यादा सही होगा कि, प्रत्येक रूप एक ‘कुंठित रूप’ है, जो सामाजिक सम्बन्धों के, नगदी, दाम और मुनाफा की आर्थिक शक्तियों के सामंजस्यशील निरूपणों जैसे व्यक्तियों पर शासन करने वाले सिक्कों के आन्दोलन की तरह प्रगट होने का कारण बनता है (मार्क्स १९७६: ५०८; मार्क्स १९९०: १६९). ‘सिक्कों’ का आन्दोलन व्यक्तियों के बीच एक निश्चित सामाजिक सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है जो वस्तुओं और सिक्कों के बीच सम्बन्धों की तरह जीवित है, और इस रिश्तेदारी में वास्तविक सामाजिक सम्बन्ध जीवित हैं, लेकिन महज उत्पादन के मुहरबंद कारिंदों जैसे. पूँजीवाद में व्यक्ति सिक्कों के आन्दोलन से सही में शासित होता है. यद्यपि सिक्के उछाल लेना चाहते हैं या अवमूल्यित हो सकते हैं, पर सिक्के कर्ता नहीं हैं. फिर भी वे किसी व्यक्ति पर स्वयं को आरोपित करते हैं और वह भी उसके भीतर से ही, पागलपन और तबाही की हद तक, नकदी और उत्पाद, पैसा और मुनाफा की समाज आवश्यक चेतना से लेकर भयानक विपन्नता और रक्तपात तक. पूंजीवादी धन-संपदा और पैसा की तरह पैसा है, तथा और पैसे की ज़रुरत स्वयं को लोगों में वस्तुकृत करती है, महज ‘मूल्य के दलाल की’ तरह, जो अपने जीवन के लिए वस्तुओं के तर्क के उद्घाटन की रीति पर आश्रित है. कैसी दानवता है! एक आर्थिक वस्तु, यह सिक्का, जो कि वास्तव में धातु के एक टुकड़े से ज्यादा कुछ भी नहीं है स्वयं को नियतिबद्ध गति में एक आर्थिक मात्रा की तरह उपस्थित करती है, ऐसी शक्ति आरोपित करती है जिससे ‘सभी मनुष्यों के प्राण टंगे हैं’. कहना न होगा कि नियति का मिथकशास्त्रीय विचार कोई कम मिथकीय नहीं हो जाता जब वह एक लौकिक ‘वस्तुओं का तर्क’ में” विमिथकीकृत (डीमाइथोलोजाइज्ड) होता है जो कि एक अमूर्त सिस्टम-लॉजिक की तरह प्रतिस्पर्धी दाम संकेतों के माध्यम से वास्तविक व्यक्तियों के आर्थिक व्यवहारों को संरचित करता है. (अडोर्नो १९९०: ३११,३२०,३१९)

वस्तुओं का लौकिक/सेक्युलर तर्क वास्तविक अमूर्तन के रूप में सामाजिक समानता की बुर्जुआ संकल्पना को अपरिहार्य बनाता है. इस तरह पैसे और कानून के शासन के समक्ष समाज के प्रत्येक सदस्य की समानता का चरित्र पूर्णतः फॉर्मल है. यह व्यक्तियों को अमूर्त नागरिकों के रूप में पहचानता है, जिनमे प्रत्येक को मानद अधिकार प्राप्त हैं, भले ही संपत्ति में असमानता हो. केवल यही नहीं, अमूर्त नागरिकों की तरह प्रत्यक्ष दमन से मुक्त लेन-देन के समान अधिकारों से युक्त उनकी फॉर्मल समानता जो कि केवल क़ानून के नियम में बंधी है, वह धन जड़ता (मनी फेटिश) द्वारा शासित होती है. अर्थात्, ‘वह शक्ति जो प्रत्येक व्यक्ति दूसरों की गतिविधि या सामाजिक संपदा के ऊपर थोपता है उसके अन्दर रहती है विनिमय मूल्य के, पैसे के मालिक की तरह. व्यक्ति अपनी सामाजिक शक्ति और साथ ही साथ समाज से अपना बंधन अपने पॉकेट में लिए घूमता है’ (मार्क्स १९७३: १५६-५७). धन जड़ता के बारे में मार्क्स लिखते हैं कि ‘ एक सामाजिक सम्बन्ध, व्यक्तियों के बीच एक निश्चित सम्बन्ध…एक धातु, एक पत्थर की तरह प्रकट होता है, मानो कोई शुद्धतः बाह्य भौतिक वस्तु हो और इस रूप में प्रकृति में खोजा जा सकता हो, और जो रूप में अपने प्राकृतिक अस्तित्व से अभिन्न है’ (१९७३:२३९). आर्थिक वस्तुमत्ता एक समाज संगठित वस्तुमत्ता है- सामाजिक सम्बन्ध अपनी प्रतीति में धातु या पत्थर की तरह गायब हो जाते हैं, और यह प्रतीति उनके ऊपर और साथ ही उनके भीतर से कायम शक्ति की तरह वास्तव है. एक आर्थिक वस्तु की तरह समाज की प्रतीति में जो प्रकट होता है, वह व्यक्तियों के बीच एक निश्चित सामाजिक आपसदारी है जो आर्थिक वस्तुओं की आपसदारी की तरह जिंदा रहती हैं. आर्थिक वस्तुओं का आन्दोलन वर्ग विभाजित व्यक्तियों को औपचारिकतः समान नागरिक की तरह शासित करती है, जो सामाजिक पुनरुत्पादन की अपनी लड़ाइयों के भीतर से धातु के टुकड़ों को चेतना और संकल्प प्रदान करते हैं. यह संकल्प स्वयं को एक स्वाभाविक प्राकृतिक शक्ति के रूप में और अदृश्य सिद्धांतों द्वारा नियमन में आरोपित करता है. समाज किसी अनुभवातीत वस्तु की तरह प्रकट होता है जो एक ‘अदृश्य हाथ’ के माध्यम से सामाजिक व्यक्तियों पर शासन करता है, जो ‘ राजा और भिखारी दोनो का ख्याल’ (अडोर्नो १९९०: २५१) रखता है.

मार्क्स आर्थिक अमूर्तनों द्वारा शासन को पूँजी के प्रवर्ग के साथ ग्रहण करते हैं. पूँजी मूलतः सामाजिक सम्बन्धों के एक निश्चित रूप का नाम मात्र है.[12] पूँजी आर्थिक वस्तु जैसा समाज है, और यह वस्तु मूलतः मूल्य वस्तु है. मूल्य अदृश्य है, एक भूत जैसा (बेलोफियो, २००९). मूल्य का भूत प्रकट होता है और पैसे जैसे पैसे के रूप में. ‘क्षणिक बर्बरता’ (मार्क्स और एंगल्स १९९७: १८) के बिंदु तक काम से बंधा वर्ग अपनी श्रम शक्ति के मुआफखोर शोषण से टंगा है. वह अपनी रोज़गार योग्यता और साथ ही निर्वाह तक पगार-आधारित पहुँच बनाये रखती है, केवल बेशी मूल्य के समर्थ उत्पादक की तरह. श्रम शक्ति का खरीददार और बेशी मूल्य के उत्पादक श्रम बाज़ार में औपचारिकतः समान नागरिकों की तरह कॉन्ट्रैक्ट करते हैं. खरीददार मुनाफे के संसाधन की तरह श्रम शक्ति का ठेका लेता है. मजदूर रोज़ी-रोटी के लिए बेचता है. ऐसे श्रम-काल की कोई गिनती नहीं होती जो मुनाफा नहीं पैदा करता. या तो यह मुनाफे के लिए खर्च हुआ है या बेकार है. मुनाफे के लिए, खोने को कोई समय नहीं है. मुनाफा बनाने में अक्षम नियोक्ता दिवालिया हो जाते हैं, जिससे रोज़गार की क्षति होती है. इसलिए यह सोच कि पूंजीवादी समाज अमूर्तनों द्वारा शासित है, पहली दफा जैसा दीखता है उससे कुछ ज्यादा बताता है. जीवन-काल श्रम काल है. जीवन-काल के लिए संघर्ष निरंतर है और उसी तरह श्रम शक्ति के खरीददार के लिए मुनाफा बनाते हुए जीवन के साधनों तक पहुँच के निर्वाह का संघर्ष भी. आर्थिक वस्तुमत्ता उसे छिपाती है जो महत्वपूर्ण है. आर्थिक मात्राओं के आन्दोलन की तरह समाज की प्रतीति में छिपा हुआ, नज़रों से ओझल, साध्य को पूरा करने में लगा जीवन की तीव्र बेचैनी है- श्रमिकों के लिए, आदमी के दूसरे वर्ग के मुनाफे के लिए काम करना रोज़ी-रोटी कमाने की आवश्यक परिस्थिति है. कहना न होगा कि श्रमिक इसी शर्त पर रोजी-रोटी पाती है कि उसकी श्रम शक्ति का उपभोग अपने खरीददार के लिए बेशी मूल्य पैदा करता है. नाकाम श्रम शक्ति की विक्रेता अपने बदले किसका व्यापार कर सकती  है- देह और देह के तत्त्वों का: न जाने कितनों को पोर्नोग्राफी के लिए, कितनों को वेश्यावृत्ति के लिए, नशेड़ियों के लिए, किडनी बेचने के लिए कितनों का?  

आर्थिक शून्यों की तरह बेरोजगारों का मैक्रो-इकनोमिक गुना-गणित असत्य नहीं है. यह साफ़ करता है कि श्रम शक्ति के विक्रेताओं का जीवन अपने जिंदा रहने के लिए अपने श्रम से बेशी मूल्य के लाभक्षमता निष्कासन पर आश्रित है. मूल्य में बेशी के लिए श्रमरत रहना मजदूर की संकल्पना में अन्तर्निहित है. वह संपदा की ऐसी व्यवस्था से है जिसमें उसके श्रम की उपयोगिता केवल मुनाफे का साधन होने में है. संवेदनशील क्रिया न केवल आर्थिक वस्तुओं की, नगदी, दाम, और मुनाफे की, अतिसंवेदनशील दुनिया में ओझल हो जाती है. यह उसमें प्रकट भी होती है- निर्वाह के साधनों तक अपनी पहुँच बनाने रखने के लिए मजदूर वर्ग संघर्ष की तरह और नाकामी के खतरे से बचने के लिए प्रतियोगी श्रम बाजारों पर झगड़े की तरह. यह श्रम शक्ति के नियोक्ताओं की आपसी प्रतियोगिता में भी प्रकट होती जहाँ दिवालिएपन से बचने के लिए प्रत्येक दूसरों की प्रतिस्पर्धा में मूल्य के रूप, अर्थात् श्रम काल के समाज आवश्यक निष्पादन के सामान्य तुलनांक की तरह पैसे में सामाजिक श्रम के अपने निजी अभिग्रहण की वैधता के प्रयास में लगा रहता है. यह आर्थिक तर्क असत्य नहीं है कि मुनाफा दिवालिएपन से बचने का साधन है. यह आर्थिक अमूर्तन जैसे समाज का सच बताता है. प्रत्येक व्यक्ति पूंजीपति को लगातार बढ़ानी होती है ‘ अपनी पूँजी, ताकि इसे बचाया जा सके, लेकिन वह केवल प्रगतिशील संचय के सहारे ही बढ़ोतरी कर सकता है’ (मार्क्स १९९०: ७३९). इस तरह प्रत्येक व्यक्ति पूंजीपति ज्यादा से ज्यादा बेशी मूल्य निष्कासन के माध्यम से अमूर्त संपदा के साथ अपना रिश्ता बनाए रखने के लिए सक्रिय हो उठता है, मौजूदा मूल्यों के प्रतिस्पर्धात्मक क्षरण और विलोपन की पीड़ा झेलते हुए. इस तरह प्रत्येक व्यक्ति पूंजीपति सामाजिक पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक श्रम काल को दबाने के लिए बाध्य है ताकि बेशी मूल्य उत्पादन का अतिरिक्त श्रम काल बढ़ सके, श्रम की उत्पादक शक्ति को गुणा करके मुनाफे के रूप में धन का विस्तार करते हुए.

आर्थिक अमूर्तनों का शासन महान धन के मालिकों का हितैषी है, इस तथ्य का मतलब यह नहीं कि नियंत्रण उनके हाथों में है. पूँजीवाद की व्यक्तिबद्ध आलोचना पूँजीवाद को सोच/थॉट से स्पर्श नहीं करती. इसके बदले, एक तरफ यह पूंजीपतियों को यह कह कर नकारती है कि वे अपने स्वार्थ के लिए पूंजीवादी विकास को भ्रष्ट कर रहे हैं दूसरी ओर पूँजी की पहचान एक ऐसे आर्थिक औजार की तरह करते हैं जिसे बेशी मूल्य के सम्पत्तिहीन उत्पादकों के हित में लगाया जा सकता है. इस तरह पूंजीपतियों की आलोचना अनायास ही कामगार वर्ग के हित में पूँजीवाद के अगले विकास के लिए एक तर्क में बदल जाती है. कामगारों के हित में पूँजीवाद के कारगर होने के लिए, यह सामाजिक श्रम के पूर्ण रोज़गार का तर्क देती है और केंद्र योजित कारखाने में समाज के रूपांतरण का लक्ष्य रखती है.[13]

वास्तविक अमूर्तन और धन-संपदा का समय

मैंने ऊपर कहा कि माल रूप एक सामाजिक सम्बन्ध की तरह अदृश्य हो जाता है; वास्तव में यह एक अमूर्त आर्थिक तर्क को आरोपित करता है, जो गायब सामाजिक कर्ता को वस्तुगत आर्थिक नियमों के मानवीकरण की तरह हाज़िर करता है. पूंजीवादी सामाजिक कर्ता लाभदायक समतुल्य विनिमय सम्बन्धों का एक मूल्य कर्ता है. इस अनुच्छेद में इस आखिरी पंक्ति के अर्थ की व्याख्या होगी. इसकी शुरुआत लाभदायक समतुल्य विनिमय के अंतर्विरोधी चरित्र की छान-बीन से होती है. विनिमय या तो समतुल्य मूल्यों का आपसी विनिमय है या फिर लाभदायक है; बुर्जुआ समाज में यह दोनों है- पदों में एक अंतर्विरोध जो कि इसके वस्तुगत भ्रम में अंतर्भूत है.

पूंजीवादी विनिमय सम्बन्ध समतुल्य विनिमय सम्बन्ध हैं. दो समान मूल्यों के बीच कोई भेद या भिन्नता नहीं है. विनिमय समतुल्य पूर्णतः सार निरूपक है और इसलिए बदली गयी वस्तुओं की मूर्त उपयोगिता के प्रति उदासीन है. विनिमय समतुल्य किसी अदृश्य वस्तु को अभिव्यक्त करता है जिसका चरित्र न तो दैवीय या इल्हामी है और न ही प्राकृतिक. मार्क्स के शब्दों में कहें तो यह पूंजीवादी धन-संपदा के सामान्य तुल्यांक की तरह पैसा के रूप में समाज आवश्यक श्रम काल के निजी अभिग्रहण को अभिव्यक्त करता है (मार्क्स १९९०: अध्याय१, सेक्श. ३). किसी माल का विनिमय मूल्य पैसे की निश्चित संख्या जैसा दिखता है. पैसे के रूप में पूंजीवादी धन-संपदा ‘मूल्य के निरंतर लुप्त होते स्फुरण’ (मार्क्स १९७३: २०९) को प्रत्यक्ष करती है. एक बार अगर पैसे के रूप में मूल्य अभिव्यक्त हो गया, तब फिर बार-बार इसे ऐसा करना होगा ताकि ‘स्वयं में मूल्य जोड़ते रहने की इसकी गुप्त योग्यता’ (मार्क्स: १९९०: २५५) बची रहे- पैसा संचलन में फेंका जाता है ज्यादा पैसा पाने के लिए, जो कि समतुल्य विनिमय के सहारे मुनाफे के रूप में हासिल होता है. (M…M’, जैसे £100=£120). पैसा और ज्यादा पैसा के बीच समतुल्य विनिमय के इस ‘अभिशप्त’ यथार्थ की संकल्पता ‘इसमें शामिल मनुष्यों की चेतना से’ (अडोर्नो १९७६: ८०) स्वतंत्र है पर ठीक उसी समय जिसे यह केवल स्वयं सामाजिक व्यक्तियों में और उनके द्वारा ही कायम रखती है. सामाजिक श्रम का निजी अभिग्रहण धन-संपदा के समतुल्य रूप की तरह पैसे से लेन-देन में मूल्य वैधता हासिल करता है. जिसे वैधता हासिल नहीं होती उसे अवमूल्यित और नष्ट किया जाता है, भले ही उनसे मानव ज़रूरतें पूरी हो सकती हों. पैसा वस्तुओं के मूल्य को वैधता देता है. ‘भ्रम यथार्थ पर हावी होता है’ (अडोर्नो १९७६: ८०) और ऐसा होता है क्योंकि ‘विनिमय मूल्य, जो कि उपयोग मूल्य की तुलना में महज एक मानसिक निर्मिति है, मानव ज़रूरतों पर हावी होता है और उनकी जगह ले लेता है’ (वही). उत्पादन सम्बन्धों की समझदारी वह कुंजी है जिससे पूंजीवादी धन-संपदा अर्थात् वास्तविक अमूर्तन के रूप में संपदा की स्वचालित जड़ता जैसी पैसे की सामाजिक निर्मिति को उघाड़ सकते हैं.

मार्क्स के यहाँ सामाजिक रूप से ज़रूरी श्रम काल की संकल्पना सबसे महत्वपूर्ण है. मूल्य के सामाजिक गठन की मार्क्स की जानी-पहचानी परिभाषा- ‘समाज आवश्यक श्रम काल किसी दिए गए समाज के लिए सामान्य उत्पादन स्थितियों के भीतर और उस समाज में उपलब्ध श्रम की कुशलता और दक्षता की औसत डिग्री के साथ किसी उपयोग-मूल्य को पैदा करने में लगा श्रम-काल है’- सारभूत समय की सार्वजनीन समानुपातिकता (universal commensurability) के रूप में श्रम के निजी अभिग्रहण के सामाजिक चरित्र को अभिव्यक्त करती है (मार्क्स १९९०: १२९). यह समय स्वयं से जुड़ते चलने वाली समांगी इकाइयों में प्रगट होता है, संभवतः अनादि से अनंत की ओर गतिशील. समय प्रगति की अपनी शक्ति प्रतीत होता है, अपने आप समय की इकाइयों को जोड़ते हुए अनवरत आगे बढ़ता हुआ, मानो यह कोई प्राकृतिक शक्ति है जो वास्तविक घटनाओं के समय से विलग मनुष्य जीवन को घड़ी की सुइयों के टिक और टॉक में बदल देती है. यह प्रतीति यथार्थ है. पूँजीवाद में समय सात्विभूत (ontologised) होता है (अडोर्नो १९९०: ३३१). यह सात्विभूत समय मूल्य का समय है, और मूल्य का समय समाज आवश्यक श्रम का समय है. मूल्य का समय एक वास्तविक अमूर्तन है. यह स्वयं को विनिमय के दौरान सामाजिक श्रम काल की समान इकाइयों के बीच समतुल्य विनिमय की तरह आरोपित करता है.[14] सामाजिक श्रम, समाज आवश्यक श्रम काल, और विनिमय में मूल्य वैधता का त्रिदेव (holy trinity) अदृश्य हैं. इनकी वस्तुमत्ता मायावी है. फिर भी, मूल्य की भूतही वस्तुमत्ता पैसा रूप में दृश्यमान होती है; पीछे उत्पादन में वह भूत, पिशाच में बदल जाता है जो मूल्य के मानव पदार्थ की तरह जिंदा श्रम पर आश्रित है, जो बेशी पैदा कर सकता है और इस तरह स्वयं से ज्यादा है (देखें बेलोफियो २००९: १८५). समाज आवश्यक श्रम काल पहले से मालूम या स्थिर किया हुआ नहीं है. जो श्रम काल ‘कल तक बिलाशक एक यार्ड लिनन के उत्पादन के लिए समाज आवश्यक था, आज नहीं है’ (मार्क्स १९९०: २०२).  श्रम काल का मूर्त व्यय समाज आवश्यक श्रम काल के रूप में वैध है या नहीं यह (उत्पादन) के बाद (post-festum) विनिमय में स्थापित होता है. तबाही का दर्द सहते हुए भी जिंदा श्रम का व्यय इस आशा में किया जाता है कि यह समाज आवश्यक होगा और इस तरह पैसे के लेन-देन में मूल्य वैधता हासिल करेगा. ‘समय पैसा है’, बेंजामिन फैंकलिन ने ऐसा कहा था, और कोई कह ही सकता है कि पैसा समय है. और अगर, पूँजीवाद मूर्त मानव परिस्थितियों और उद्देश्यों से विलग, सबकुछ को समय, एक इकाई से दूसरी इकाई तक चलने वाले बराबर, समांगी, और नियत इकाइयों में विभाज्य, एक अमूर्त समय में सीमित करता है, तो, समय वास्तव में सबकुछ है. अगर ‘समय सबकुछ है, (तो) आदमी कुछ नहीं है; वह ज्याद से ज्यादा समय की ठठरी है’ (मार्क्स १९७५: १२७)- ‘मानवीकृत श्रम-काल’ (मार्क्स १९७५: १२७) की ठठरी. सामाजिक रूप से मान्य श्रम का व्यय अपने स्वयं के अच्छे समय में संपन्न नहीं होता. यह समय के भीतर होता है, मूल्य के समय के भीतर, जो कि समाज आवश्यक श्रम काल का व्यय है. विनिमय प्रक्रिया का अमूर्तन, जिसे सॉन-रेथल का पद वास्तविक अमूर्तन रेखांकित करता है, ‘किसी समाजशास्त्री द्वारा सोचने के अमूर्त तरीके में निहित नहीं होता बल्कि स्वयं समाज में होता है’ (अडोर्नो २०००: ३२). दूसरे शब्दों में, ‘सभी मालों का श्रम-काल में परिवर्तन उतना ही अमूर्त है, लेकिन उतना ही यथार्थ भी, जितना सभी जैविक निकायों का वायु में विलयन’ (मार्क्स १९७१: ३०). पूंजीवादी श्रम का समय प्रगट होता है, धन-संपदा के किसी अमूर्त रूप की मुनाफाखोर जमाखोरी के रूप में, ज्यादा पैसा बनाने वाले पैसा के रूप में. जो मुनाफे में न बदला जा सके उसे जला दिया जाता है.

पूंजीवादी विनिमय सम्बन्ध समतुल्य विनिमय (M…M’) की तरह पैसे के बदले और ज्यादा पैसे का विनिमय संभव करता है. और ज्यादा पैसे की तरह पैसे के समतुल्य मूल्य की प्रतीति में जो प्रतीत होता है वह सामाजिक श्रम शक्ति के मूल्य और मजदूर द्वारा सामाजिक धन-संपदा के उत्पादन में व्यतीत श्रम-काल का अंतर है. श्रम शक्ति का मूल्य श्रम शक्ति के सामाजिक पुनरुत्पादन के लिए जरूरी समाज आवश्यक श्रम काल है. इस तरह यह मजदूरों के एक वर्ग के पुनरुत्पादन के लिए ज़रूरी समय है. श्रम शक्ति की नियुक्ति, श्रम शक्ति का यह मूल्य, कामकाजी दिन के एक निश्चित हिस्से में पुनरुत्पादित कर देता है, जिसे मार्क्स आवश्यक श्रम काल कहते हैं. इस श्रम काल के बाद जो भी समय काम में खर्च करते हैं वह श्रम काल के मूल्य के पुनरुत्पादन के अतिरिक्त होता है. मार्क्स इस श्रम काल को बेशी श्रम काल कहते हैं. यह बेशी मूल्य उत्पादन का समय है. और ज्यादा पैसे के बदले पैसे के समतुल्य विनिमय के रहस्यमय चरित्र का संबंध माल श्रम शक्ति का बेशी मूल्य उत्पादक श्रम क्रिया (M…P…M’) में रूपांतरण से है.[15] ज्यादा पैसे की खातिर, अपना जीवन जीने के लिए मजदूर द्वारा खर्च श्रम-काल को कम करना इसका सार है. यही वह परिस्थिति है जहाँ समाज के (सहज) पुनरुत्पादन के लिए ज़रूरी समय के पार श्रम काल को खींचा जाता है. इस खिंचे हुए श्रम काल में बेशी श्रम काल शामिल है जो सामाजिक धन-संपदा का विस्तार करता है, मूल्य में बेशी पैदा करता है, जो मुनाफे का आधार है. इस तरह असमान मूल्यों के बीच समतुल्य विनिमय के रहस्यमय चरित्र की समझदारी ‘बेशी मूल्य की संकल्पना में’ निहित है (अडोर्नो १९९७, १९६२: ५०८). विनिमय में पैदा होने वाली विषय-वस्तु की तरह वास्तविक अमूर्तन की सॉन-रेथल की संकल्पना को विस्तृत करते हुए अडोर्नो कहते हैं कि समतुल्य विनिमय सम्बन्ध उत्पादन के साधनों के मालिकों और बेशी मूल्य के उत्पादकों के बीच के ‘वर्ग सम्बन्ध पर’ आधारित हैं, और उनका तर्क है कि यह सामाजिक आपसदारी पैसे की एक मात्रा के बदले दूसरे के विनिमय की तरह इसकी आर्थिक प्रतीति में छू-मंतर हो जाती है (५०६). आर्थिक वस्तुमत्ता के वास्तविक अमूर्तन के रूप में समाज बेशी मूल्य निष्कासन को अपना गुप्त आधार बनाता है.

निष्कर्ष          

न तो पूंजीपति न ही बैंकर और न ही मजदूर वास्तव में उस यथार्थ से खुद को बाहर निकाल सकते हैं जिनमे वे रहते हैं और जो स्वयं को न केवल उनके ऊपर बल्कि उनके माध्यम से और उनके द्वारा ही आरोपित करता है. आर्थिक कर्ता के रूप में समाज व्यक्तियों के माध्यम से कायम है. पैसा दुनिया को नहीं घुमाता; इसका स्वामित्व जीवन के साधनों से संपर्क जोड़ता है. जीवन के साधनों तक पहुँच की लड़ाई पैसे के लिए लड़ाई है- यह बुर्जुआ समाज की मानसिकता को शासित करता है. कैसी कंगाली है! महान सामाजिक संपदा के आगे, बेशी मूल्य के उत्पादक एक दिन से दूसरे दिन तक खुद को महज पूंजीवादी धन-संपदा के लिए बने बनाए मानव पदार्थ की तरह जिंदा रखते हैं. दरअस्ल किसी तरह जिंदा रहना जीवित श्रम की वास्तविक जीवन-प्रक्रिया है. जैसा यह दीखता है वैसा नहीं है. (ज्यादा पैसे के रूप में) पैसे के लिए संघर्ष बुर्जुआ समाज को नियंत्रित करता है, मानो यही उसका वस्तु निजरूप है. ‘समाज का आन्दोलन’ न केवल ‘शुरू से ही शत्रुतापूर्ण है’ (अडोर्नो १९९०: ३०४). यह ‘स्वयं को कायम भी केवल शत्रुता के माध्यम से ही रखता है’ (३११). अर्थात्, वर्ग संघर्ष इस मिथ्या समाज की वस्तुगत जरूरत है. यह इसकी अवधारणा में ही शामिल है. ∆K में छिपा हुआ ज़िंदा रहने और सामाजिक पुनरुत्पादन के लिए संघर्ष करता है.[16] मजदूर वर्ग समाजवाद के लिए नहीं लड़ता. यह अपनी ज़रूरतें पूरा करने के लिए लड़ता है. श्रम शक्ति के बेदखल विक्रेताओं की लड़ाई ‘भूख से डिक्टेट होती है’ (अडोर्नो २००५: १०२).

परम्परागत मार्क्सवादी संकल्पनाओं से अलग, उत्पादक श्रमिक होना कोई सात्विक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति नहीं है. इसके बदले ‘यह एक भयानक दुर्भाग्य है’ (मार्क्स १९९०: ६४४). पूँजी में मार्क्स पूंजीवादी वर्ग सम्बन्धों को माल श्रम शक्ति के विक्रय से विकसित करते हैं. परन्तु, श्रम शक्ति में व्यापार निर्वाह के साधनों से आश्रित श्रम का विलगाव पूर्वाशित करता है, जिसके चलते सम्पति-हीन श्रमिक श्रम शक्ति का स्वतंत्र विक्रेता हो पाता है. श्रम की बिक्री और आर्थिक बाध्यता की नींव के रूप में दमन श्रम शक्ति में स्वतंत्र और समान व्यापार की अनिवार शर्त है (देखें बोन्फेल्ड, २०११). एक तरफ, श्रम बाज़ार औपचारिकतः समान व्यापारियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित श्रम शक्ति की खरीद-फ़रोख्त की संस्था है, जहाँ एक खरीदता है मुनाफा बनाने के लिए और दूसरा बेचता है ज़िंदा रह पाने के लिए. दूसरी ओर, श्रम शक्ति के व्यक्तिबद्ध विक्रेताओं के बीच श्रम बाज़ार की प्रतिस्पर्धा शामिल है, जहाँ प्रत्येक स्वयं को लैंगिक और नस्लीय, और राष्ट्रीयकृत श्रम बाज़ारों में भी किसी तरह बनाये रखना चाहते हैं, जहाँ आगजनी और लूट-पाट से लेकर वर्गीय एकजुटता तक, और कंगाली से लेकर सामूहिक सौदेबाजी तक, गैंगबाज ठगी से लेकर निर्वहन-सहयोग संगठित करने के सामुदायिक रूपों तक, हड़ताल-तोड़ने से लेकर सामूहिक कारवाई तक, गला काट प्रतियोगिता कई रूपों में अनुभूत होती है.

निर्वाह के साधनों तक पहुँच के लिए संघर्ष, सामूहिक या एक दूसरे के खिलाफ, या दोनों, श्रम शक्ति के बेदखल विक्रेताओं के वर्ग के अस्तित्व में अन्तर्निहित है. मजदूर वर्ग का संघर्ष पगार और स्थितियों के लिए संघर्ष है; यह जीवन के लिए और जीवन के साधनों तक पहुँच के लिए संघर्ष है. यह ‘बेशी मूल्य के लिए’ खरीददार की ‘भेड़ियों जैसी भूख’ और बेगार श्रम काल के अतिरिक्त अणुओं के अभिग्रहण के खिलाफ और इस तरह अपने जीवन को महज समय की ठठरी तक सीमित किये जाने के खिलाफ संघर्ष है. वे लड़ते हैं एक ऐसे जीवन के खिलाफ जो केवल श्रम काल से बुनी जाती है और इस तरह जीवन को महज आर्थिक संसाधनों तक सीमित किये जाने के खिलाफ लड़ते हैं; और वो रोज़गार के लिए लड़ते हैं ताकि जीवन के साधनों तक पहुँच बना सकें. इस तरह वे मानव सार्थकता के लिए लड़ते हैं, और सबसे बढ़ कर भोजन, वस्त्र, आवास, गर्माहट, प्रेम, लगाव, ज्ञान, आनंद के लिए समय, और गरिमा के लिए लड़ते हैं. ‘स्वयं-में’ वर्ग की तरह उनकी लड़ाई वास्तव में ‘स्वयं- के लिए’ लड़ाई है. जीवन के लिए, मानव विशिष्टता, जीवन-काल, और सबसे ऊपर आधारभूत मानव जरूरतों की संतुष्टि के लिए. मजदूर वर्ग जीने के लिए, निर्वाह और आराम के लिए लड़ता है. यह ये सब उन स्थितियों में करता है जहाँ इनके द्वारा उत्पादित भौतिक धन-संपदा अपने पूंजीवादी रूप की सीमा से परे ठेलती है. (उसमें मिसफिट रहती है). और तब, पुराने उद्धरण को दुहराते हुए कहें तो, समाज ‘अपने आप को अचानक क्षणिक बर्बरता की स्थिति में पड़ा पाता है; ऐसा लगता है मानो अकाल ने, तबाही के एक विश्वयापी युद्ध ने निर्वाह के तमाम साधनों की आपूर्ति भंग कर दी है’ (मार्क्स और एंगेल्स १९९७:१८).

यह सूक्ति कि ‘पूँजी वर्ग संघर्ष है’ (होल्वे ११९१: १७०) किसी सकारात्मक और वांछित वस्तु को अभिव्यक्त नहीं करती. इसके बदले यह उत्पादन के पूंजीवाद संगठित सामाजिक सम्बन्ध पर एक निर्णय है, जिसमे ‘ मनुष्यों की ज़रूरतें, मनुष्यों की संतुष्टि, कभी भी एक दिखावे से ज्यादा नहीं है’ (अडोर्नो २००८: ५१). वर्ग संघर्ष ही, वास्तविक आर्थिक अमूर्तन की वस्तु के रूप में समाज की , मूल्य अमूर्तन की तरह धन-संपदा की, गतिशील शक्ति है.

निष्कर्षतः, वर्ग समाज की आलोचना श्रम शक्ति के खरीददारों और बेशी मूल्य के उत्पादकों के बीच साफ़-सुथरे और न्यायसम्मत विनिमय सम्बन्धों को हासिल करने में अपना समाधान नहीं पाती. ‘अपना पेट भरने के लिए शब्द चबाने वाले’ (अडोर्नो: २००५: १०२) सम्पत्ति-हीन मजदूरों के पक्ष में पुनर्वितरण उन्हें ज्यादा सहूलियत में रखने के लिए परम आवश्यक है. इसी कारण, पुनर्वितरण समाजवादी आलोचना के लिए सुविधाजनक गल्प है, जो श्रम आर्थिकी के एक ऐसे रूप में पूंजीवादी रूपांतरण की कल्पना करते हैं जो उजरती दासों के लिए आरामदेह है. वर्ग समाज की आलोचना अपना सकारात्मक समाधान केवल वर्गविहीन समाज में देखती है, जिसमें सामाजिक व्यक्ति स्वयं को बेशी मूल्य उत्पादकों के एक आश्रित वर्ग द्वारा पोषित वास्तविक आर्थिक अमूर्तनों के आन्दोलन के रूप में अब वस्तुकृत नहीं करते. इसके बदले यह समाज कम्युनिस्ट व्यक्तियों के समाज में स्वयं को वस्तुकृत करता है.     


[1] On the points raised here, see Gunn (1992), Murray (2016), Postone (1993), and Bonefeld (2014). On social nature, see Schmidt (1971).

[2] Economics deals with economic quantities without being able to tell us what they are. For the sake of establishing itself as a science of economy matter, it seeks to make economic things intelligible. For this reason it rejects the inclusion of the human social relations into economic argument as a metaphysical distraction.  Economics is however quite unable to establish itself as social science in distinction to society.  As Joan Robinson put it in exasperation about the seeming inability of economics to establish itself as a science of economic matter: ’K is capital, ∆K is investment. Then what is K? Why, capital of course. It must mean something, so let us get on with the analysis, and do not bother about these officious prigs who ask us to say what it means’ (1962, p. 68). On the difficulty of economics to establish itself as a discipline without subject matter, see Bonefeld (2014 chap. 2).

[3] On ghost-walking, see Marx (1966, chap. 48).

[4] On abstract labour, see Bonefeld (2010).

[5]   On Sohn-Rethel conception of real abstraction, see Engster and Schlaudt (2018).

[6] The German original says ‘Historischer Materialismus ist Anamnesis der Genese.’

[7] Traditional social theory divides society into system-logic and social action and considers this divide as a dialectic of structure and struggle or structure and agency, which is the premise of hegemonic social theory (see Bonefeld, 1993; 2016b). Economics conceives of it as a relationship between spontaneous market structure and rational individual behaviour.

[8] In distinction, Habermas’ social theory accords to acting subjects the power to prevent the total colonisation of their life-world by the forces of the system, keeping a space for non-instrumental properties, such as empathy and human warmth. On Habermas as a traditional thinker of system-logic and social action, see Reichelt (2000) and Henning (2018).

[9]   Emphasis added, and translation altered, based on the German original.

[10] See Postone (1993) for a critique of Marxian economics as a series of programmatic statements about the rational planning of essentially capitalist labour relations. Contemporary notions of anti-austerity as a politics of economic planning present the same misconceived idea. See for example Panitch etal (2010) and Varoufakis (2013). For critique, see Bonefeld (2012) and Grollios (2016).

[11]   As the tradition of dialectical materialism argues wrongly. On this point, see also footnote 1.

[12] On this, see Bonefeld (2014).

[13] Leninism is not an alternative to capitalism, nor are its reformist competitors or radical off-springs.

[14] On this, see Bonefeld (2010).

[15] M…P…M’ (or M…M’, for short) is the classical expressions for the transformation of Money into the Production of essentially surplus value that is realised in exchange in the form of  greater amount of Money that expresses the extracted surplus value in the form of profit. See Bonefeld (1996) for a fuller account.

[16] On ∆K see footnote 2.

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