• बेशीकृत आबादी के संकट ने एक बार फिर दिल्ली शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. कृषि से जुड़े मजदूरों ने दिल्ली को उ.प्र.,हरियाणा,पंजाब,राजस्थान आदि से जोड़ने वाली हाईवे का चक्का-जाम कर रखा है.
  • पहले ‘कश्मीर’ ‘CAA-NRC’ ‘लॉकडाउन’ ‘NEP’ और अब कृषि कानूनों के सहारे मजदूरों की बेशीकृत आबादी  के संकट को राष्ट्रीय स्तर पर बांधने और नए सामाजिक-तकनीकी विभाजन के सहारे समाज के त्वरित वित्तीयकरण की राजसत्ता की सारी कोशिशें झटके खा रही है.
  • सरकारें घबराहट में आन्दोलनकारियों को ‘बिचौलिया’ ‘खालिस्तानी’ ‘घुसपैठिया’ ‘माओवादी’ आदि बताने लगी है ताकि दिल्ली के बाकि मजदूरों को आन्दोलन के खिलाफ भड़का कर दिल्ली दंगों जैसी राज्य-प्रायोजित हिंसा दुहराई जा सके.
  • जाने-अनजाने इस सरकारी प्रोपगेंडा को दो तरह के लोग हवा दे रहे हैं. पहला, जो इस आन्दोलन को महज ‘धनी-किसानों’(‘ग्रामीण-बुर्जुआ’) और ‘अम्बानी-अडानी’(‘शहरी-बुर्जुआ’) की ठेके की लड़ाई की तरह देख रहे हैं और इनके खिलाफ मजदूरों के किसी ‘शुद्ध’ रूप के अवतरित होने का इंतज़ार कर रहे हैं. दूसरे वे जो ‘किसान-मजदूर-एकता’ या ‘संयुक्त मोर्चा’ बनाने के नाम पर आन्दोलन के सामाजिक अंतर्विरोधों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों ही किसी न किसी रूप में आन्दोलन में ‘किसान’ की संकटग्रस्त पहचान(अस्मिता) को पुनरुत्पादित कर रहे हैं और दिल्ली के बाकि मजदूरों की आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी को अवरुद्ध कर रहे हैं.
  • जबकि इस आन्दोलन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी तथाकथित मंझोले, छोटे और सीमांत ‘किसानों’ की है. जिनके लिए केवल खेती से परिवार का पेट पालना भी मुश्किल है. इसलिए तो साल के बड़े समय दूसरे के खेतों में या शहरों में मजदूरी के लिए भागते फिरते हैं. फिर भी कर्ज का चक्र और आत्महत्या. इसलिए सही अर्थों में यह ‘किसान’ नहीं बल्कि मजदूरों की बेशीकृत आबादी का संघर्ष है.
  • क्या उ.प्र.,बिहार,बंगाल,उड़ीसा,महाराष्ट्र,असम,तमिलनाडु,नेपाल आदि से काम की तलाश में दिल्ली जैसे शहरों में चक्कर काट रहे मजदूर नहीं जानते कि कृषि का प्रश्न मजदूरों के लिए कोई मुनाफ़े का  नहीं बल्कि केवल और केवल खुद को मजदूर के रूप में जिन्दा रखने का प्रश्न है? शहरों में जब रोजगार नहीं मिलता तो गाँव भागना पड़ता है. खाने-पीने का एक हिस्सा गाँव से हो जाता है इसलिए कम से कम दिहाड़ी में ठेकेदार यहाँ खटाते हैं. लॉकडाउन में कैसे एक झटके में शहरों ने हमे उगल दिया और अब फिर से निगल रही है लेकिन बेहद कम सामाजिक मजदूरी पर. सब की सैलरी कट.
  • हमारे लिए तो गाँव और शहर अब एक ही चक्र के दो पड़ाव मात्र हैं. जैसे शहरों में एक रोजगार से निकलने और दूसरा रोजगार पकड़ने के बीच खुद को मजदूर की तरह जिन्दा रखने के लिए रेड़ी-पटरी, दुकानों, ढाबों, ठेला-रिक्शा, इ-रिक्शा, ऑटो, कैब, डिलिवरीबॉय, रिशेप्सनिस्ट, डाटा एंट्री, एडिटर, ट्रांसलेटर, स्कूल, यूनिवर्सिटी, केयर टेकर, गार्ड, घरों में झाड़ू-पोछा-बर्तन इत्यादि का काम कर लेते हैं. ठीक उसी तरह गाँव में कुछ समय खेत-मजदूरी या मनरेगा भी कर लेते हैं.
  • यानि रोजगार की अनियमितता और अनिश्चितता समाज के बड़े हिस्से को लगातार ‘स्व-रोजगार’ या ‘स्टार्ट-अप’ (‘पकौड़े बेचने’!) पर विवश कर देती है. ‘स्व-रोजगार’ या ‘स्टार्ट-अप’ दरअसल छुपी हुई बेरोजगारी है जहाँ हमारा एक पैर हमेशा कंगाली और कर्ज के दलदल में फंसा रहता है. क्या मंझोले, छोटे और सीमांत ‘किसानों’ की स्थिति ठीक ऐसी ही नहीं है?
  • अब बड़ी-बड़ी ठेका कंपनियाँ इन ‘स्टार्ट-अप’ या ‘स्व-रोजगार’ को सीधे-सीधे समाज के वित्तीयकरण  का आधार बना रही है. फाइनेंस-टेक्नोलॉजी ग्लोबल-ऑनलाइन-नेटवर्क को विनियमित और नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है. ताकि हमारे जिन्दा रहने का संकट सीधे-सीधे पूंजी के संचयन को तेज करने के अवसर में बदल जाये.
  • ग्लोबल पूंजी का लोकल ठेकेदार मोदी-शाह ‘आत्म-निर्भर भारत’ के जुमले के सहारे कोरोना-लॉकडाउन को इसी अवसर की तरह देख रहा है. शिक्षा,श्रम,स्वास्थ और कृषि के क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर विनियमित और केंद्रीकृत करने वाले कानूनों की जल्दबाजी इसी दिशा में एक और कदम है. नया ठेकेदार पुराने ठेकेदारों की नीतियों को ही वैचारिक और वैधानिक चोला पहना रहा है.
  • ऐसे में कृषि-कानूनों के खिलाफ आन्दोलन सीधे-सीधे बेशीकृत आबादी का आन्दोलन है. इसलिए यह हम सब का आन्दोलन है. हमारी सामाजिक जमीन हमसे छीन उसी जमीन पर बंधुआ मजदूरी कराने के खिलाफ हमारी निर्णायक लड़ाई है.
  • हमें पता है कि कैसे शुरुआत में ओला-उबर,जोमैटो-स्विग्गी,अमेज़न,रिलाएंस-जिओ जैसी कंपनियों ने कुछ बेहतर मजदूरी और ऑफर देकर हमारे सामाजिक नेटवर्क पर अपना कब्ज़ा बनाया और अब न सिर्फ हमसे कमर-तोड़ मेहनत करवा रहे बल्कि कर्ज के चक्कर में हमारे भविष्य को भी गुलाम बना रहे हैं?
  • ऐसे में क्या दिल्ली शहर के बाकि मजदूरों को भी अपना आन्दोलन तेज़ नहीं कर देना चाहिए? क्या हमें भी भीतर से दिल्ली शहर का चक्का-जाम नहीं कर देना चाहिए? अपनी-अपनी काम की जगहों पर हड़ताल नहीं कर देनी चाहिए?
  • सामाजिक कारखाने में सामाजिक हड़ताल. यही समाज के वित्तीयकरण के खिलाफ हमारी निर्णायक लड़ाई का पहला कदम है. जिसकी झलक पिछले कुछ आंदोलनों में हमें दिखाई दे रही है.

  • सामाजिक कारखाने में सामाजिक हड़ताल. यही समाज के वित्तीयकरण के खिलाफ हमारी निर्णायक लड़ाई का पहला कदम है. जिसकी झलक पिछले कुछ आंदोलनों में हमें दिखाई दे रही है.

सहचर CityNotes Collective