CityNotes

In-Against and Beyond Capital

About Us

हमारे बारे में:

  • समूह के रूप में भी हम रोज़मर्रापन से नहीं बच सकते. रोज़मर्रापन एक ऐसी समंजनकारी ताकत है जो हमारी विशिष्ट स्थितियों को लील लेती है. इस ताकत के खिलाफ सामूहिक करने की कोशिश एक दाँव है. करने का आत्मनिर्धारण एक जोखिम है. फिर भी दुनियाभर में लोग अपनी क्रियाओं पर सामूहिक आत्मनियंत्रण के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जोखिम उठा रहे हैं. यह संघर्ष रोज़मर्रापन के दुहराव के खिलाफ है. ‘एक खाली समांगी समय’ के खिलाफ. दिन-रात के चौबीस घंटे के खिलाफ. ये घंटे जिनमे हमारे करने को बाँधा जाता है. हमारे करने को अर्थ मिलता है. हमें पहचान मिलती है. हमारी रचनाप्रक्रिया का वास्तविक अमूर्तन होता है. करना अमूर्त श्रम हो जाता है. सबसे पहले मार्क्स ने श्रम के इस दुहरे चरित्र का पर्दाफाश किया था और पूंजीवादी समाज की जड़ता और उसकी अनश्वरता का घमंड भहरा कर गिर पड़ा. रोजमर्रापन का आतंरिक संघर्ष, उसका मौलिक शत्रुतापूर्ण चरित्र स्पष्ट हुआ. करना और करने पर सामूहिक आत्मनियंत्रण के प्रयासों को दबा कर ही निजी या राज्य अधिग्रहण फलीभूत होता है. सामूहिक उत्पादन पर निजी या राज्य अधिग्रहण पूंजीवादी सम्बन्द्धों की आत्यंतिक प्रकृति है. हमें व्यक्तियों के समूह के रूप में पुनुरूत्पादित करने में ही रोज़मर्रा का दुहराव है. सामूहिक करने के आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया में हमें विकसित होते कामकाजी सम्बन्धों या नौकरशाही की आलोचना करनी पड़ती है. आत्मनियंत्रण 24*7 का सवाल बन कर सामने आता है. घर-बाहर की सारी दुनिया मानो इस आत्मनियंत्रण के खिलाफ हुयी जाती है. सबसे पहले पैसे का संकट सामने आता है. जिसकी कमान वैल्यू या अमूर्त श्रम के हाथ में है. सस्ता और सस्ता माल पूंजीवादी उत्पादन की ताकत है. ऐसी स्थिति में जिंदा रहना मात्र अमूर्त श्रम के सहारे संभव जान पड़ता है. हमारे करने का बलात् अमूर्तन होता है. हिंसक अमूर्तन. सामूहिक करने को व्यक्तिबद्ध करते रहने के लिए पुलिस-फौज और नौकरशाही तैनात रहती है. सामाजिक आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया राज्य नियंत्रित प्रक्रिया में रूपांतरित होती जाती है.
  • समूह के रूप में मूल्य की समंजनकारी ताकत के खिलाफ सामूहिक उत्पादन का प्रश्न हमारे सामने बना हुआ है. चूँकि हमारा सामूहिक उत्पादन विशिष्ट स्थितियों में है इसलिए उत्पादन यहाँ एक निषेधात्मक रचना-प्रक्रिया है. ऐसी स्थिति में हमारा सामूहिक करना अगर सेल्फ वैलोराइज़ेशन है भी तो वह अमूर्त श्रम के अन्दर, उसके खिलाफ और उससे परे की निषेधात्मक प्रक्रिया है. हम व्यक्ति या समूह के रूप में रोजमर्रापन के विरुद्ध विद्रोह करते हैं. हड़ताल करते हैं. निषेध इस रचना प्रक्रिया का आरंभिक क्षण है.
  • हम अलग-अलग रास्तों से चलते हुए एक साथ आये हैं. हमारा साथ-साथ आना कई प्रवृत्तियों का एक पुंज है. आलोचना और आत्मालोचना की प्रक्रिया इस पुंज को एक गतिशील रूप प्रदान करती है. यह असहमति की प्रक्रिया है. वैकल्पिक राजनीति और पार्टी-वाम की कार्यपद्धति एवं सिद्धांत निर्माण के स्थापित रूपों से छिटके हुए, असंतुष्ट और नए की तलाश में हाथ-पैर मारते. नौकरशाही से नफ़रत करते, पार्टी लाइन की पक्की दीवारों से सर टकराते, ठेठ राजनीतिक निर्णयों से लेकर मार्क्सवाद के जड़ अकादमीकरण की प्रक्रियाओं की आलोचना करते हुए हम साथ-साथ आए- साथ-साथ आ रहे हैं. हमारा साथ-साथ आना पुराने रूपों में ‘मिसफिट’ है. सिद्धांत के रूप में मार्क्सवाद के जड़ीभूत संस्थानीकरण या अवसरवादी मार्क्सवाद तथा मजदूरवर्ग के क्रांतिकारी आत्मसंगठनात्मक प्रयासों के जड़ीभूत रूपों या लेनिनपंथी पार्टी-जड़ता की रचनाप्रक्रिया की आलोचना और आत्मालोचना दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. इसी क्रम में हमारा झुकाव मजदूर-काउंसिल या सोवियत या मजदूरों की आमसभा और सामाजिक आत्मनिर्णय की राजनीति की ओर उत्तरोत्तर बढ़ता गया है.
  • चारू मजुमदार के ऐतिहासिक आठ दस्तावेजों में इस एकीभूत रचनाप्रक्रिया (अकादमीकरण या अवसरवादी मार्क्सवाद और लेनिनपंथी जड़ता या पार्टी-रूप बनने की एकीभूत रचनाप्रक्रिया) से वास्तविक विच्छेद की झलक मिलती है. ‘इलाका दखल’  केवल एक फौरी कार्यनीति नहीं है बल्कि नए क्रांतिकारी व्यवहार का सिद्धांत भी है. ‘इलाका दखल’  नए सामाजिक सम्बन्धों की प्रस्तावना है- एक कम्युनिस्ट प्रस्तावना. आर्थिक घेराबंदी और नए सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण जैसी कार्यनीतिक ज़िम्मेदारी के मूल में वह अंतर्दृष्टि है जहाँ सामाजिक आत्मनिर्णय की प्रक्रिया ही ‘राजनीति की स्वायत्ता’ का आधार बनती है. शास्त्रीय भाषा में कहें तो सर्वहारा का अधिनायकत्व इस सामाजिक आत्मनिर्णय की प्रक्रिया से अभिन्न है. राज्य-सत्ता वास्तविक सामाजिक सम्बन्धों के बाहर कहीं नहीं है. ‘इलाका दखल’ सामाजिक शक्ति सम्बन्धों में अन्तर्निहित श्रेणीकरण की प्रक्रियाओं मसलन प्रतिनिधित्व या पहचान की प्रक्रियाओं या संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रियाओं की वास्तविक आलोचना करती है. इस प्रकार ‘इलाका दखल’ आर्थिक और राजनीतिक के अलगाव की प्रक्रियाओं के ख़िलाफ़ और उससे परे सामाजिक आत्मनिर्णय की कम्युनिस्ट कार्यनीति है. अवसरवादी मार्क्सवाद इस अलगाव को यथार्थ और पहले से उपस्थित मान कर राज्य-सत्ता और निर्णय के सापेक्ष स्वायत्ता की व्याख्या करता है. जबकि विद्रोह, हड़ताल या निषेध के आरंभिक क्षणों में यह अलगाव स्थगित होता है. दरअसल इस सच को दबा कर ही अलगाव संभव है. दिया गया यथार्थ कैसे आकार ग्रहण करता है इस पर उनकी दृष्टि नहीं जाती. ‘इलाका दखल’  निषेध का उज्ज्वल पक्ष है और हमारे लिए पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक भी. राज्य-सत्ता को सम्पूर्ण सामाजिक सम्बन्धों की, सम्बन्धों की पूर्णता की अभिव्यक्ति करार देने से ‘इलाका दखल’ या ‘मुक्त क्षेत्र’ अनिवार्यतः राज्य-सत्ता केन्द्रित कार्यनीति में सीमित हो गया. राज्य-सत्ता की बागडोर जिस पैसे और मूल्य या अमूर्त श्रम के हाथों है वह नज़रों से ओझल हो गया. सामाजिक सम्बन्धों के सचेत और क्रांतिकारी नवनिर्माण की प्रक्रिया को दबा कर केवल राज्य-सत्ता पर कब्जा का उद्देश्य ‘इलाका दखल’ की कार्यनीति को न केवल सीमित करता है बल्कि मजदूर वर्ग की घृणा, हिंसा और शहादत की भावनाओं को रह्स्यीकृत भी करता है. हमारे लिए ‘इलाका’ केवल क्षेत्र, स्पेस या भू-भाग नहीं बल्कि ‘अवकाश’ या ‘समय’ भी है. ‘इलाका दखल’ अमूर्त समय की धारा को रोकने के लिए लगाया गया बेंजामिन का आपातकालीन ब्रेक और सामूहिक करने के अपने अनंत समय का निर्माण दोनों है. सशस्त्रता अगर इस प्रक्रिया की आन्तरिकता से अलग है तो वह सैन्यवाद है. ऐसा सैन्यवाद पूँजी के सम्बन्धों की विशेषता है. बुर्जुआ राज्य-सत्ता की स्वीकृति है. 
  • सैद्धांतिक स्तर पर इस कार्यनीति ने मार्क्सवाद को क्रांतिकारी सिद्धांत के रूप में पुनर्न्वेषित किया. किसानों, छात्रों और महिलाओं के विद्रोहों ने समाज में उजरती और ग़ैर-उजरती श्रम विभाजन पर ज़ोरदार हमले किये. मजदूर वर्ग को बनाए रखने वाले इस आतंरिक विभाजन की अस्थिरता ने वर्ग के रूप में इसके निषेधात्मक चरित्र को प्रकट किया. किसानों, छात्रों और महिलाओं का विद्रोह मजदूर वर्ग के गैर-उजरती हिस्सों का उजरती सम्बन्धों के विरुद्ध विद्रोह था. माओ का मुक्त क्षेत्र और व्यापक भूमि-सर्वेक्षणों की कार्यनीति तथा इटली में रिफ्युजल और वर्कर्स कोइन्क्वायरी की कार्यनीति सामाजिक सम्बन्धों की सामूहिक आलोचना और आत्मालोचना को सामाजिक आत्म-निर्णय का आतंरिक क्षण मानती है. इस तरह का वर्ग-विश्लेषण एक सामूहिक कार्यवाही है जो सामाजिक अंतर्विरोधों को तीव्र करती है. उनके शत्रुतापूर्ण चरित्र को स्पष्ट करती है.      
  • सामूहिक बुद्धि से सामूहिक देहों के अलगाव का एक तरीका नौकरशाही है जो कि सामाजिक सम्बन्धों का एक ख़ास रूप है. सामाजिक मेलमिलाप का यह तरीका पूँजी की सामाजिकता को बनाये रखने में अपना अप्रतिम योगदान देता है. लेन-देन के रिश्तों को नौकरशाही मैनेज करती है. निजबद्ध मनुष्यों की भीड़ बनती है. सतत प्रतियोगितारत. नौकरशाही की आलोचना इस अलगाव की वास्तविक आलोचना है. हमें करने से इनकार नहीं है. हम करेंगे लेकिन इसलिए नहीं कि तुम्हारा आदेश है. सामूहिक करना ऐसे आदेश की खुली नाफ़रमानी है. एक सृजनात्मक नाफ़रमानी. सैद्धांतिक व्यवहार इस सृजनात्मक नाफ़रमानी का सहचर है. अलगाव की प्रक्रिया अगर जड़ीभूत होने की प्रक्रिया है तो सैद्धांतिक व्यवहार इसके ठीक विपरीत है. वह निजबद्ध सामाजिक रूपों की सीमा दिखाने के क्रम में ही सामूहिक बुद्धि को रोज़मर्रा के संघर्षों के बीच खींच लाता है. खींचने की कोशिश करता है. सामूहिक बुद्धि की निजबद्ध सीमाओं और निजबद्ध के सामाजिक-विचारधारात्मक रूपों की आत्मालोचना एक सैद्धांतिक व्यवहार है.
  • निजबद्धता के आत्मसंघर्ष के भीतर सामाजिक का उद्दाम आवेग है. यह आवेग निजबद्ध होकर ही उसके खिलाफ और उससे परे नयी सामाजिकता की ओर आत्म-प्रक्षेपण है. सामूहिक करने का संकट इस अनुपस्थित, निषिद्ध सामाजिकता की अभिव्यक्ति का संकट है. यह अभिव्यक्ति किसी आगामी कल के लिए टाली नहीं जा सकती. वह वर्तमान संघर्षों में ‘आगत’ है. इस ‘आगत’ का जोखिम उठाना, अमूर्त श्रम के खिलाफ करने के सामाजिक प्रवाह का दावा करना एक ऐसी सृजनात्मकता की मांग करता है जिसे ब्रेष्ट ‘अनवरत उत्पादन’ कहते हैं. समूह के रूप में हमारे अखबार, पर्चे या ब्लॉग लेखन आदि इसी अनवरत उत्पादन का एक तरीका है. यहाँ संचलन सामूहिक उत्पादन का ही आतंरिक क्षण है. यह कोशिश अपने साथ कई-एक जोखिम उठाने को बाध्य है. ‘आत्म-संदर्भीकरण’ की यांत्रिकता का जोखिम ऐसा ही है. छोटे से समूह की तरह करने का यह ख़तरा हमेशा बना रहता है. सवाल इसकी आत्मालोचना का है. इस यांत्रिकता की आत्मालोचना का मतलब है समूह के सदस्यों के रूप में रोजमर्रापन के खिलाफ संघर्ष के सामूहिक प्रयासों में योग. ऐसा अक्सर होता है कि ‘आत्म-संदर्भीकरण’ ‘आत्म-सत्यापन’ का मुखौटा बन जाता है. ऐसी स्थिति में हमारा सामूहिक प्रयास इटैलियन मजदूरवादियों के हॉट-इन्क्वायरी के रूप में ही संभव है. यहाँ हम साथ-साथ चलते हुए संवाद करते हैं. यह संवाद स्वयं सैद्धांतिक व्यवहार है. आत्म-नियंत्रण के सामूहिक प्रयासों में या करने के सामाजिक आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया में सैद्धांतिक व्यवहार दरअस्ल एक मित्र-संवाद ही तो है! यह दीगर बात है कि यह समूह मार्क्सवादी अंतर-दृष्टि को संवाद के क्रम में हमेशा सामने रखने की कोशिश करता है. यह मार्क्सवादी अंतर-दृष्टि है- क्रिटिक ऐड-होमिनेम या आत्मालोचना की परम्परा है जिसके सहारे हम अपने करने के बहुविध तरीकों के भीतर- भेदों के भीतर- सतत कांट-छाँट में सक्षम होते हैं और भीतरी वैरभाव की अभिव्यक्ति का जोखिम उठाते हैं. यह अमूर्तन की सामंजस्यकारी प्रक्रियाओं के संकट को बढ़ाता है.          
  • श्रम-शक्ति देहों में मूर्त होती है. अकारण नहीं कि मार्क्स ने पूंजीवाद को उजरती-दासप्रथा वाला समाज कहा था. करने के अमूर्तन के खिलाफ सामूहिक करने का विद्रोह- देह-विद्रोह है. सामूहिक करना एक संवेदनशील मानवीय गतिविधि है. इस तरह यह रोज़मर्रा की गतिविधियों से बाहर नहीं है और अपने अमूर्तन के निषेध का उद्दाम आवेग उन्हें रचनात्मक बनाता है. छोटे से समूह के रूप में हमारा करना सीमित है. इसी वजह से हम सामूहिकता को परिभाषित करने की कोशिश करने लगते हैं. श्रम-विभाजन के ख़ास सामूहिक कटघरे को दूसरों की अपेक्षा कुछ ख़ास सहूलियतें हासिल हैं, विशिष्ट गुण हासिल हैं, इतिहास ने उन्हें ही ख़ास उद्देश्य के लिए चुना है- ऐसी बातें पिछले ज़माने में संभव हो तो हो आज असंभव है. व्यापक कौशलहीनता/डी-स्किल्लिंग और अभूतपूर्व अस्थिरता या दूसरे शब्दों में कैसुअल-ठेके की पैठ ने ऐसे किसी सामाजिक श्रम-विभाजन को बहुत भंगुर कर दिया है. अकारण नहीं कि श्रम-विभाजन के एक विशिष्ट रूप की तरह लेनिनपंथी पार्टी-रूप बहुत गहरे संकट में है. फैक्ट्री-मजदूरों की विशिष्ट पहचान का आधार यह है कि उनके अधिशेष-श्रम का सीधा अधिग्रहण होता है. इस पहचान को वर्ग-संघर्ष या काम के खिलाफ संघर्ष के केंद्र में रखने से दो बातें संभव होती है. एक तरफ तो मौलिक अंतर्विरोध को श्रम और पूँजी के बीच देखा जाता है. श्रम का पूँजी के खिलाफ संघर्ष ट्रेड-यूनियन चेतना को बनाता है जबकि इस संघर्ष की पूर्णता को जानने के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी की ज़रुरत बनी रहती है . दूसरी ओर मजदूरों के आत्म-प्रयासों को, उनके सामूहिक करने को अमूर्त श्रम से पूर्ण-स्वायत्त, पार-ऐतिहासिक बताया जाता है और इस तरह ठोस श्रम या करने से अमूर्त श्रम का सम्बन्ध आतंरिक न रह कर बाह्य हो जाता है.
  • रूप और अंतर्वस्तु सम्बन्धी बहसों में ‘बाह्य-सम्बन्धों’ के रूप में द्वंद्वात्मकता की व्याख्या प्रभावी रही है. द्वंद्वात्मकता को जो बाह्य सम्बन्धों के बदले आतंरिक सम्बन्ध की तरह देखते हैं उनके यहाँ भी बहस ‘रूप की अपनी विशिष्ट अंतर्वस्तु’ या ‘अंतर्वस्तु का अपना विशिष्ट रूप’ से आगे नहीं जाती. पूंजीवादी समाज में अमूर्त श्रम या मूल्य हमारे करने या ठोस श्रम के होने का तरीका है. श्रम के दुहरे चरित्र के उदघाटन के क्रम में मार्क्स स्पष्ट करते हैं कि करना या उपयोगी श्रम और अमूर्त श्रम जो कि पूंजीवादी समाज में करने का विशिष्ट रूप है- उसका न केवल विरोधी है बल्कि उसे पूरी तरह रूप में बांधना असंभव है. अंतर्वस्तु रूप के बाहर नहीं है, उसके अन्दर ही है. लेकिन वह रूप से कुछ ज्यादा है. यह उसकी पकड़ से बाहर है. रूप बार-बार उसे पकड़ना चाहता है. उसकी पूर्ण-अभिव्यक्ति चाहता है. पर वह रूप के कगारों के ऊपर से बह निकलती है. पूर्ण अभिव्यक्ति का मतलब है पूँजी की मृत्यु. यह पूँजी या अमूर्त श्रम का वास्तविक संकट है. अंतर्वस्तु रूप के भीतर होकर ही उसके खिलाफ और उससे परे है. पूँजी के पहले अध्याय में मार्क्स ने इसी निषेधात्मक द्वंद्वात्मकता को सामने रखा है. होल्वे अंतर्वस्तु और रूप के इस सम्बन्ध को ek-stasis कहते हैं. जैसे जन्म के ठीक पहले बच्ची माँ के गर्भ में होकर ही माँ के विरुद्ध और उससे बाहर अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है. कुछ मजदूर स्वायत्तावादी प्रवृतियाँ सामूहिक करने को- अंतर्वस्तु को रूप से पूर्ण स्वायत्त और कालातीत और उल्लासमय आत्माभिव्यक्ति प्रदान करना चाहती हैं. अंतर्वस्तु के अतिरेक को अधिभौतिक बनाया जाता है. इस तरह मजदूर आन्दोलन में जड़-लेनिनपंथियों और नव-कांटपंथियों की एकता श्रम के कालातीत ऐश्वर्य के सहारे कायम होती है. करने का श्रम या अपने रूप के खिलाफ संघर्ष फैक्ट्री और समाज के पुराने विभाजन को तोड़ता है. समाज के सारे सम्बन्ध संकटग्रस्त होते जाते हैं. साठ और सत्तर के दशक के आंदोलनों के भीतर से श्रम का अनवरत संकट फैक्ट्री और व्यापक समाज में बना हुआ है. सामूहिक करने को मूल्य-रूप में बाँधना लगभग असंभव होता गया है.
  • एक समूह की तरह को-इन्क्वायरी को हम प्रतिभावान लोगों का विशिष्ट प्रयास नहीं मानते. केवल कुछ तेज-तर्रार और यूनिवर्सिटी शिक्षा प्राप्त कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न होने वाली दक्ष कार्यवाही को-इन्क्वायरी नहीं है. ऐसा होने का मतलब है कि अन्वेषक और वर्ग-संघर्ष का सम्बन्ध बाहरी है. ऐसा सम्बन्ध पूर्णता की धारणा और उसके धारकों का पंथ निर्माण करेगा. सैद्धांतिक गढ़ और मठ बनेंगे. NGO, विश्वविद्यालय, या कोर्पोरेट रिसर्च से जुड़े लोग को-इन्क्वायरी को वास्तविक वर्ग-संघर्ष से बाहर इसलिए वस्तुनिष्ठ मानते हैं. उनके ‘वैज्ञानिक’ आकलन के हिसाब से काम-काज और प्रोजेक्ट और नीतियाँ तय होती हैं. समूह की तरह हमारी को-इन्क्वायरी इस वस्तुनिष्ठता के खिलाफ है. इसी प्रक्रिया में सैद्धांतिक व्यवहार मित्र-संवाद होता जाता है. मित्र-संवाद वर्ग-संघर्ष की अपनी नयी भाषा से बनता-बनाता, घुलता-मिलता है. सैद्धांतिक व्यवहारों का अकादमीकरण या दर्शन होता जाना कर्म के सामाजिक प्रवाह से विलग अपना स्वायत्त रूप हासिल करना है. यहाँ कृति का रचना पर अधिकार और आधिपत्य होता है. वर्ग-संघर्ष से अलगाव और सिद्धांत का स्वयं में पृथक मूल्य- विमर्श मूल्य हासिल करना- उसका दर्शन बनना- संघर्ष की नयी भाषा को सामूहिक मजदूरों की गतिविधि से दूर करना और उसे पालतू बनाना है. उसका हिंसात्मक अधिग्रहण करना है. विमर्श-मूल्य सिद्धांत का रह्स्यीकरण करता है और इसी क्रम में नयी भाषा सामान्य-बोध का हिस्सा बनती जाती है. वह शास्त्रीय हो जाती है. अगर हमारा सामूहिक करना इस शास्त्रीयता की आत्मालोचना नहीं है तो सैद्धांतिक व्यवहार वर्ग-संघर्ष से अकादमिक पलायन का मार्ग लेने को बाध्य है. रोजमर्रे की कालिख से बचने के लिए. सिद्धांतकार का उंचा आसन बरकरार रहता है. ‘राजा मर गए! राजा चिरंजीवी हों!’ मानसिक और दैहिक श्रम का रिश्ता अपनी अस्थिरता में भी अक्षुण्ण बना रहता है. मित्र-संवाद इस अस्थिरता को अनुभव के विनिमय की सीमाओं से परे सामूहिक मजदूर के एकान्तिक संवेदनशील व्यवहारों, हमारे सामाजिक आत्मनियंत्रण के प्रयासों का अभिन्न हिस्सा बना देना है. नेता और जनता के श्रम-विभाजन को अस्थिर करने और उस अस्थिरता के प्रतिनिधि मूलक अभिग्रहण को असंभव बनाने या कहें कि रोज़मर्रा में वापसी को असंभव बनाने में मित्र-संवाद एक सैद्धांतिक हस्तक्षेप है.     
  • अतीत की खो गयी क्रांतियों का इतिहास अभी लिखा जाना शेष है जिन्हें इतिहासवाद के नीचे दबाया गया. विजेता होने का खतरा एक वास्तविक खतरा है. यह अभिव्यक्ति का जोखिम है. अपने ख़ास ऐतिहासिक काल-संयोग में हमें यह जोखिम उठाना ही पड़ता है. समूह या पार्टी की तरह काम करने की सीमाओं के भीतर रह कर यह जोखिम उठाना अब संभव नहीं. अभिव्यक्ति एक निषेधात्मक रचना प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया की शुरुआत सच्ची वेदना से है. वेदना अस्वीकार की संवेदना है. मार्क्स की आरंभिक रचनाओं में एस्त्रेंज्मेंट मजदूरों के संवेदनात्मक जगत में सत्-चित्-वेदना है. यह संवेदनात्मक जगत ‘क्लास इन इटसेल्फ’ का आधार है. रोज़ा ‘क्लास फॉर इटसेल्फ’ को सामूहिक मजदूर कहती हैं. यहाँ अन्तर-वैयक्तिक सम्बन्ध एकान्तिक सामाजिक व्यक्तित्व की प्रक्रियाओं में घुल मिल जाते हैं. सैद्धांतिक व्यवहार अंतर-वैयक्तिक- नार्मल सम्बन्धों में वापसी को असंभव करने के प्रयास में है. एकान्तिक सामूहिक बुद्धि सामूहिक देह के बिखरने या सामान्य-बुद्धि के प्रभावी होने की प्रक्रियाओं की आत्मालोचना से अभिन्न है. सैद्धांतिक व्यवहार सामूहिक बुद्धि के फंक्शनल अमूर्तन का व्यवहार है जो सामूहिक देह की एकान्तिक परम-अभिव्यक्ति में स्वयं को घुलाने-मिलाने में ही सार्थकता पाता है. सिद्धांत और व्यवहार के बीच या मानसिक और शारीरिक के बीच एक गतिशील विभाजन जो सामाजिक श्रम-विभाजन को असंभव कर दे. नए समाज का निर्माण इसी अर्थ में एक सचेत कार्यवाही है.
Create your website at WordPress.com
Get started
%d bloggers like this: